मौर्य और राजस्थान इतिहास


Saturday, March 27, 2021

 मौर्य और राजस्थान

राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन या प्रभाव

क्षेत्र में थे। अशोक का बैराठ का शिलालेख तथा उसके

उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये

मन्दिर मौर्यों के प्रभाव की पुष्टि करते हैं। कुमारपाल प्रबन्ध

तथा अन्य जैन ग्रंथों से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला

व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांगद का बनवाया हुआ है।

चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर राज मान

का, जो मौर्यवंशी माना जाता है, वि. सं. 770 का शिलालेख

कर्नल टाॅड को मिला, जिसमें माहेश्वर, भीम, भोज और मान

ये चार नाम क्रमशः दिये हैं। कोटा के निकट कणसवा

(कसुंआ) के शिवालय से 795 वि. सं. का शिलालेख मिला

है, जिसमें मौर्यवंशी राजा धवल का नाम है। इन प्रमाणों से

मौर्यों का राजस्थान में अधिकार और प्रभाव स्पष्ट होता है।

हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भारत की राजनीतिक

एकता पुनः विघटित होने लगी। इस युग में भारत में अनेक

नये जनपदों का अभ्युदय हुआ। राजस्थान में भी अनेक

राजपूत वंशों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये थे,

इसमें मारवाड़ के प्रतिहार और राठौड़, मेवाड़ के गुहिल,

सांभर के चैहान, आमेर के कछवाहा, जैसलमेर के भाटी

इत्यादि प्रमुख हंै।

शिलालेखों के आधार पर हम कह सकते हैं कि

छठी शताब्दी में मण्डोर के आस-पास प्रतिहारों का राज्य था

और फिर वही राज्य आगे चलकर राठौड़ों को प्राप्त हुआ।

लगभग इसी समय सांभर में चैहान राज्य की स्थापना हुई

और धीरे-धीरे वह राज्य बहुत शक्तिशाली बन गया। पांचवीं

या छठी शताब्दी में मेवाड़ और आसपास के भू-भाग में

गुहिलों का शासन स्थापित हो गया। दसवीं शताब्दी में

अर्थूंणा तथा आबू में परमार शक्तिशाली बन गये। बारहवीं

तथा तेरहवीं शताब्दी के आस-पास तक जालौर, रणथम्भौर

और हाड़ौती में चैहानों ने पुनः अपनी शक्ति का संगठन

किया परन्तु उसका कहीं-कहीं विघटन भी होता रहा।