Rajasthan Drainage system राजस्थान अपवाह तंत्र | नदियों के जल प्रवाह


Sunday, May 2, 2021

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अपवाह तंत्र
अपवाह:- किसी नदी या निश्चित वाहिका द्वारा अपने साथ जल का प्रवाह करना अपवाह कहलाता है।

अपवाह तंत्र :- किसी नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा किसी क्षेत्र से जल को बहाकर ले जाना अपवाह तंत्र कहलाता है।

जल संभर/जल विभाजक :-

वह सीमा जो किसी एक अपवाह तंत्र को दूसरे अपवाह तंत्र से अलग करती है जल विभाजक रेखा कहलाती है जैसे-

अरावली पर्वतमाला- महान भारतीय जल विभाजक रेखा है जिसका विस्तार पालमपुर (गुजरात) से लेकर रायसीना (दिल्ली) तक (692 किमी) है। अरावली के पूर्व में गंगा नदी तंत्र (बंगाल की खाडी) तथा पश्चिम में सिंधु नदी तंत्र (अरब सागर) है जिसके मध्य जल विभाजन का कार्य अरावली पर्वतमाला करती है।

जबकि राजस्थान में अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के जल प्रवाह के मध्य जल विभाजक का कार्य करने वाला भोराठ का पठार है जिसका विस्तार उदयपुर (गोगुन्दा) से कुम्भलगढ़ (राजसमंद) तक है। अरावली के पूर्व में बनास, बेड़च, मेनाल नदियाँ है तो पश्चिम में पश्चिमी बनास, साबरमती और लूनी है।

जलग्रहण क्षेत्र :- किसी नदी द्वारा विशिष्ट क्षेत्र से जल बहाकर लाना या जल की प्राप्ति करना जल ग्रहण क्षेत्र कहलाता है।

राजस्थान में जल ग्रहण की दृष्टि से नदियों का सही क्रम-

(1) बनास (24.21%)- पूर्णत राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी (480 km)

(2) लूनी (20.21%)

(3) चम्बल (17. 18%)- राजस्थान की सबसे लम्बी नदी (966 km)

(4) माही (9.4%)

सतही जल की दृष्टि से राजस्थान में नदियों का सही क्रम :-

भारत के कुल जल भण्डार का राजस्थान में जल (0.99%) मात्र (1%) है। उसमें भी सतही जल (1.16%) तथा भूमिगत जल (1.70%) है।

राजस्थान में भूमिगत जल अधिक होने के कारण ही यहाँ सर्वाधिक सिंचाई कुओं और नलकूपों द्वारा की जाती है।

चम्बल – राजस्थान की सबसे लम्बी बारहमासी नदी तथा राजस्थान का सबसे बड़ा नदी तंत्र है।
बनास
माही
लूनी
साबरमती
जल की उपयोगिता :- नदियों के जल का सर्वाधिक उपयोग पेयजल, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन जैव विविधता संरक्षण आदि में किया जाता है। जल की इन्ही उपयोगिताओं के आधार पर राजस्थान की नदियों का सही क्रम है :-

चम्बल
बनास
माही
साबरमती
लूनी
जल की उपलब्धता की दृष्टि से राजस्थान में नदियों का क्रम

चम्बल
बनास
माही
लूनी
साबरमती
1. राजस्थान में तीन प्रकार का अपवाह तंत्र पाया जाता है-

आंतरिक प्रवाह तंत्र - 60%
बंगाल की खाड़ी नदी तंत्र - 24%
अरब सागरीय नदी तंत्र - 16%
(1) आंतरिक प्रवाह तंत्र:-

वे नदियाँ जिनका उद्गम स्थल निश्चित होता है परन्तु समाप्ति स्थल निश्चित नहीं होता है आंतरिक प्रवाह की नदियाँ कहलाती है।
आंतरिक प्रवाह तंत्र भारत में केवल राजस्थान में पाया जाता है।
राजस्थान में सबसे बडा़ अपवाह तंत्र-आंतरिक प्रवाह तंत्र है जो कुल आंतरिक प्रवाह तंत्र का 60% है।
आंतरिक प्रवाह तंत्र की नदियाँ मुख्यत: वर्षा पर निर्भर है।
(2) आंतरिक प्रवाह तंत्र से संबंधित राजस्थान की प्रमुख नदियाँ:-

घग्घर 6 रूपनगढ़
कांतली 7 मेंथा
काकनेय 8 ढूंढ
साबी 9 खण्डेला
रूपारेल 10 खारी
(1) घग्घर नदी –शिवालिक नदी या इण्डो ब्रह्म नदी :-

अन्य नाम- द्वषवती नदी, प्राचीन सरस्वती नदी, मृत नदी
उद‌्गम – शिवालिक की पहाड़ियाँ, कालका (हिमाचल प्रदेश) से
राजस्थान में प्रवेश- टिब्बी,(हनुमानगढ़) से
विस्तार क्षेत्र- राजस्थान में हनुमानगढ़ और गंगानगर
घग्घर के प्रवाह क्षेत्र को हनुमानगढ़ में ‘नाली’ और फोर्ट अब्बास (पाकिस्तान) में ‘हकरा’ कहा जाता है।
घग्घर नदी में बाढ़ आने पर इसका पानी फोर्ट अब्बास पाकिस्तान तक जाता है और वहाँ इसके प्रवाह क्षेत्र को ‘हकरा’ कहते है।
हनुमानगढ़ में घग्घर नदी के किनारे सैन्धव सभ्यता के दो स्थल कालीबंगा और रंगमहल प्राप्त हुए है
घग्घर नदी की विशेषता :-

घग्घर नदी राजस्थान की आंतरिक प्रवाह की सबसे लम्बी नदी है (465 km)
घग्घर नदी द्वारा निर्मित मैदान को गंगानगर-हनुमानगढ़ में ‘पाट’ कहा जाता है। (घग्घर नदी का पाट-नाली कहलाता है)
(2) कांतली नदी :-

शेखावटी प्रदेश (चुरु-झुंझुनूँ-सीकर) की मुख्य नदी-कांतली नदी पूर्णत: राजस्थान में बहने वाली आंतरिक प्रवाह की सबसे लम्बी नदी है (100 किमी.)
उद्गम- खण्डेला की पहाड़ियाँ (सीकर)
सीकर, झुन्झुनूँ में बहती हुई चुरु जिलें में प्रवेश कर रेतीली भूमि में विलुप्त हो जाती है।
प्रवाह क्षेत्र-कांतली नदी का प्रवाह क्षेत्र तोरावाटी कहलाता है । (तंवर राजपूतों का क्षेत्राधिकार होने के कारण)
नीम का थाना-सीकर में कांतली नदी के किनारे गणेश्वर सभ्यता की खोज की गई।
गणेश्वर सभ्यता-भारत में ताम्र युगीन सभ्यताओं की जननी कहलाती है।
(3) काकनेय नदी :-

अन्य नाम –मसूरदी नदी/काकनी नदी
उद्गम- कोटड़ी की पहाड़ियाँ (जैसलमेर) से
काकनेय नदी राजस्थान की आंतरिक प्रवाह की सबसे छोटी नदी है।
काकनेय नदी जैसलमेर में मीठे पानी की बुझ झील का निर्माण करती है।
(4) साबी नदी :-

उद्गम-सेवर की पहाड़ियाँ (जयपुर)
प्रवाह क्षेत्र- जयपुर,अलवर
साबी नदी अलवर जिले की मुख्य नदी है।
जयपुर की सेवर पहाड़ियों से निकल अलवर के बहरोड़, मुण्डावर एवं तिजारा में बहती हुई हरियाणा में प्रवेश कर विलुप्त हो जाती है।
साबी नदी राजस्थान की एकमात्र नदी है जो राजस्थान से हरियाणा जाती है।
साबी नदी किनारे प्राचीन सभ्यता जोधपुरा प्राप्त हुई।
(5) रूपारेल नदी :-

अन्य नाम–रूपनारायण नदी/वराह नदी/लसावरी नदी
उद्गम-उदयनाथ की पहाड़ियाँ, थानागाजी (अलवर)
प्रवाह क्षेत्र-अलवर से भरतपुर तक
रूपारेल नदी पर भरतपुर में मोती झील बाँध निर्मित है जो भरतपुर की लाइफ लाइन कहलाता है।
मोती झील बाँध से लोहागढ़ (भरतपुर) में सुजान गंगा चैनल निकाला गया है।
रूपारेल नदी के किनारे (भरतपुर) में नोह सभ्यता (लौहयुगीन) के अवशेष प्राप्त हुए है।
(6) रूपनगढ़ नदी :-

सलेमाबाद (अजमेर) से बहते हुए जयपुर जिलें में सांभर झील में गिरती है।
रूपनगढ़ नदी के किनारे सलेमाबाद (अजमेर) में निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ स्थित है।
(7) मेन्था नदी :-

अन्य नाम –मदा/मेढा
उद्गम – मनोहपुरा की पहाड़ियाँ (जयपुर)
प्रवाह क्षेत्र-जयपुर (बहते हुए उत्तर की ओर से सांभर झील में गिरती है)
Note:- मेन्था, ढूंढ, खारी, खण्डेला नदी उत्तर की ओर से सांभर झील में गिरती है। आंतरिक प्रवाह का सबसे अच्छा उदाहरण सांभर झील है।

• वे नदियाँ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपना जल अरब सागर में ले जाती है अरब सागरीय नदी तंत्र की नदियाँ कहलाती है।

• अरब सागरीय नदी तंत्र राजस्थान के कुल अपवाह तंत्र का (16%) है। यह राजस्थान का सबसे छोटा अपवाह तंत्र है।

• अरब सागरीय नदी तंत्र की नदियाँ एश्चुरी (ज्वारनदमुख) का निर्माण करती है क्योंकि इन नदियों की गति तेज होती है तथा समुद्र से दूरी कम होने के कारण ये तीव्र वेग से समुद्र में गिरकर एश्चुरी का निर्माण करती है।








(1) लूनी नदी :-

लूनी नदी की कुल लम्बाई 495 किमी है जबकि राजस्थान में लूनी नदी की लम्बाई 330 किमी है।
लूनी नदी का उद्गम नाग पहाड़, पुष्कर (अजमेर) से होता है जहाँ इसका प्रारंभिक नाम सागरमती है।
गोविन्दगढ़ (पुष्कर) से आने वाली सरस्वती नदी मिलने के बाद इसे लूनी कहते है।
अजमेर के नाग पहाड़ से निकलकर नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर तथा जालोर के अर्द्वशुष्क क्षेत्रों में बहकर गुजरात के ‘कच्छ का रन’ में लूनी विलुप्त हो जाती है।
लूनी नदी के अन्य नाम –

वैदिक साहित्य में – मरूद्‌वृधा
कालीदास में – अन्त: सलिला
प्रारंभिक नाम – सागरमती (अजमेर)
लवणवती नदी – लवण की मात्रा अधिक होने के कारण
आधी खारी-आधी मीठी नदी – बालोतरा (बाड़मेर) तक लूनी का पानी मीठा रहता उसके बाद लूनी नदी में लवणता की मात्रा बढ़ जाती है।
लूनी नदी की विशेषताएँ –

लूनी पश्चिमी राजस्थान मरूस्थलीय प्रदेश की मुख्य नदी है।
लूनी बेसिन में प्राचीन कांप मृदा (बांगर) का विस्तार है।
लूनी नदी के प्रवाह क्षेत्र को जालोर में रेल/नेडा़ कहा जाता है।
राजस्थान का प्राचीनतम पशु मेला-मल्लीनाथ पशुमेला तिलवाडा़ (बाड़मेर) में लूनी नदी के किनारे भरता है।
अजमेर में अधिक वर्षा (अतिवृष्टि) होने पर बाड़मेर के बालोतरा में लूनी में बाढ़ आती है।
वर्तमान में लूनी नदी रंगाई छपाई उद्योग से निकलने वाले रसायन युक्त जल के कारण प्रदूषित हो रही है।
लूनी नदी तंत्र से संबंधित परियोजनाएँ-

जसवंतसागर बांध (पिचियाक बांध)-
लूनी नदी, बिलाडा़ (जोधपुर)

जवाई परियोजना:-
जवाई नदी, सुमेरपुर (पाली)
यह वृह्द श्रेणी की सिंचाई परियोजना है। जिसका संबंध पाली, बाड़मेर, जालोर, उदयपुर जिले से है।
जवाई नदी पर पश्चिमी राजस्थान का सबसे बडा बांध जवाई बांध बना हुआ है।
जवाई बांध का निर्माण 1946-1956 के मध्य अकाल राहत कार्य के दौरान जोधपुर के महाराज उम्मेदसिंह ने करवाया था।
जवाई बांध को मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते है।
जवाई बांध में पानी की आवक बनाए रखने हेतु उदयपुर में सेई परियोजना का निर्माण किया गया।
हेमावास बांध :-
बाण्डी नदी, हेमावास (पाली)
यहाँ जायद की फसल अधिक होती है जैसे- खरबूजा
बांकली बांध :-
सूकडी़ नदी- बांकली (जालोर में)
Note :- हेमावास तथा बांकली बांध दोनो मध्यम श्रेणी की सिंचाई परियोजना है।

लूनी की सहायक नदियाँ :-

लीलड़ी - लूनी में मिलने वाली पहली सहायक नदी (सोजत-पाली)
मीठड़ी - पाली
बाण्डी – राजस्थान की सबसे प्रदूषित नदी (हेमावास-पाली)
सूकडी़ – जालोर का सुवर्णिगिरी दुर्ग इसी नदी के किनारे है। (देसुरी-पाली)
जवाई – लूनी की सबसे लम्बी सहायक नदी इस पर
जवाई बांध बना हुआ है। जिसे मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते है।

- जवाई की सहायक नदी मथाई नदी के किनारे रणकपुर जैन मंदिर बने हुए है।

- जवाई नदी (सायला-जालोर) में खारी नदी आकर मिलती है जिसके पश्चात जवाई नदी सूकड़ी II के नाम से जानी जाती है।

सागी - जसवंतपुरा पहाडी़ (जालोर) से लूनी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी है।
जोजडी़ – लूनी की एकमात्र ऐसी सहायक नदी जो लूनी में दांयी ओर से आकर मिलती है और जिसका उद्गम अरावली की पहाडी़ नही है। ये नागौर के पोडलू गांव से निकलती है।
(2) पश्चिमी बनास नदी –

उद्गम - नया सनवाड़ (सिरोही) से

प्रवाह क्षेत्र - सिरोही

समाप्ति - कच्छ का रन ( गुजरात)

पश्चिमी बनास के किनारें गुजरात का डीसा शहर बसा है। इसकी सहायक नदी सीपू नदी है।

(3) साबरमती नदी –

उद्गम – अरावली पहाडी़ (झाडोल-उदयपुर)

प्रवाह क्षेत्र – उदयपुर

समाप्ति – खंभात की खाडी़ (गुजरात)

साबरमती निकलती राजस्थान से है पर राजस्थान में न्यूनतम प्रवाह क्षेत्र वाली नदी है।
गुजरात की राजधानी-(गांधीनगर) तथा अहमदाबाद शहर और साबरमती आश्रम साबरमती नदी के किनारे है।
हथमती, सेई, वैतरक, मानसी-वाकल आदि साबरमती की सहायक नदियाँ है।
जल संरक्षण एवं संग्रहण-अरब सागरीय नदी तंत्र

वे नदियाँ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपना जल अरब सागर में ले जाती हैं अरब सागरीय नदी तंत्र की नदियाँ कहलाती हैं।

अरब सागरीय नदी तंत्र राजस्थान के कुल अपवाह तंत्र का (16%) है। यह राजस्थान का सबसे छोटा अपवाह तंत्र है।

अरब सागरीय नदी तंत्र में चार मुख्य नदियाँ शामिल है





माही नदी-

माही नदी को आदिवासियों की गंगा/कांठल की गंगा/दक्षिणी राजस्थान की गंगा कहते हैं।

माही बेसिन को प्राचीन काल में पुष्प प्रदेश कहते थे क्योंकि यहाँ महुआ ज्यादा पाया जाता था।

माही नदी का विस्तार तीन राज्यों में (मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात) में है।

माही नदी की कुल लम्बाई 576 किमी. है जबकि राजस्थान में इसकी लम्बाई 171 किमी. है।

माही नदी के विस्तार क्षेत्र को छप्पन का मैदान/कांठल का मैदान भी कहते हैं।

माही नदी का उद्गम धार-मध्यप्रदेश की विंध्याचल पर्वत श्रेणी की मेहद झील से होता है।

राजस्थान में माही नदी प्रवेश खांदू-बाँसवाड़ा से प्रवेश करती है। जहाँ से 23\frac12\%23
2
1

% उत्तरी अंक्षाश रेखा गुजरती है

दक्षिण राजस्थान में बांसवाडा़ और डूँगरपुर में बहते हुए माही नदी खंभात की खाड़ी (गुजरात) में जाकर गिरती है।

माही नदी की विशेषताएँ-

माही नदी कर्क रेखा (23\frac12\%23
2
1

% उत्तरी अंक्षाश) को दो बार काटती है।

यह अंग्रेजी के उल्टे U वर्ण का निर्माण करती है।

राजस्थान की एकमात्र नदी जो दक्षिण से प्रवेश करती है तथा दक्षिण में ही समाप्त होती है।

बेणेश्वर-डूंगरपुर में माही नदी सोम-जाखम के साथ मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है जहाँ प्रत्येक वर्ष की माघ पूर्णिमा को बेणेश्वर मेला भरता है जिसे आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है।

नोट – कांगो / जायरे नदी - भूमध्य रेखा (0°अक्षांश / विषुवत रेखा) को दो बार काटती है।

लिम्पूप नदी – मकर रेखा (23\frac12\%23
2
1

% दक्षिणी अंक्षाश) को दो बार काटती है।

माही नदी की सहायक नदियाँ-

इरू, चाप, लाखन, जाखम, सोम, मोरेन, भादर, एरण हरण और अनास नदी माही की सहायक नदियाँ है।

माही नदी में सबसे पहले मिलने वाली सहायक नदी इरू है जो माही बजाज सागर परियोजना से पहले मिलती है।

राजस्थान में माही नदी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी अनास है जो दक्षिण की ओर से आकर माही में मिलती है।

जाखम नदी-

माही की मुख्य सहायक नदी जाखम का उद्गम भंवरमाता की पहाड़ियाँ (जाखमिया ग्राम-प्रतापगढ़) से होता है और यह बेणेश्वर-डूंगरपुर में आकर माही नदी से मिलती है जहाँ सोम नदी भी आकर माही नदी में मिलती है और तीनों मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है जहाँ बेणेश्वर मेला (आदिवासियों का कुंभ) भरता है।

सरमई तथा करमई जाखम की सहायक नदियाँ हैं। करमई नदी जाखम से प्रतापगढ़ में मिलती है जहाँ जाखम बाँध बना हुआ है तथा सरमई नदी भी प्रतापगढ़ में जाखम नदी से मिलती है जहाँ सीतामाता अभयारण्य बना हुआ है।

जाखम का प्रवाह क्षेत्र-प्रतापगढ़, डूँगरपुर है।

सोम नदी-

सोम नदी का उद्गम बीच्छामेडा़ की पहाड़ियाँ (ऋषभदेव उदयपुर) से होता है और यह बेणेश्वर डूँगरपुर में आकर माही नदी में मिल जाती है जहाँ सोम-माही-जाखम तीनों मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है।

गोमती, टीडी, झूमरी सोम नदी की सहायक नदियाँ हैं।

उदयपुर में सोम नदी पर सोम कागदर परियोजना तथा डूंगरपुर में सोम नदी पर सोम-कमला-अम्बा परियोजना स्थित है।

इरू नदी-

माही नदी में सबसे पहले मिलने वाली सहायक नदी है जो माही में उत्तर की ओर से आकर माही बजाज सागर परियोजना से पहले मिलती है। इरू का प्राचीन नाम एराव था।

अनास नदी -

राजस्थान में माही नदी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी है जिसका उद्गम आबोर ग्राम की पहाड़ियाँ (मध्यप्रदेश) से होता है।

राजस्थान में अनास नदी मेलेडी खेडी बांसवाडा़ से प्रवेश करती है और गलियाकोट-डूँगरपुर में यह माही नदी में मिलती है। (जहाँ दाउदी बोहरा सम्प्रदाय का उर्स भरता है)

माही नदी तंत्र से संबंधित परियोजना

माही नदी पर प्रमुख परियोजनाएँ निर्मित हैं

माही बजाज सागर परियोजना-बांसवाड़ा

कागदी पिकअप बाँध- बाँसवाडा़

भीखाभाई सागवाड़ा परियोजना-डूँगरपुर

कडाना बाँध (गुजरात)

माही बजाज सागर परियोजना-

यह राजस्थान और गुजरात की संयुक्त परियोजना है जिसमें राजस्थान की 45 प्रतिशत तथा गुजरात की 55 प्रतिशत की भागीदारी है।

माही नदी पर बोरखेडा़ (बाँसवाडा़) में माही बजाज सागर बाँध बना हुआ है जो राजस्थान का सबसे लम्बा बाँध है (3109 मीटर)

माही बजाज सागर परियोजना एक बहुउद्देशीय योजना है जिससे बाँसवाडा़-डूँगरपुर का आदिवासी बहुल प्रदेश का आर्थिक विकास हो सके।

कागदी पिकअप बांध -

माही नदी पर बाँसवाडा़ में कागदी पिकअप बाँध बना हुआ है जिसके सभी गेट खोलने पर डैम में एक भी बूंद पानी नही रहता है।

कागदी पिकअप बाँध सैलानियों का प्रमुख आकर्षण केंद्र है।

भीखाभाई सागवाडा़ परियोजना-

त्वरित सिंचाई लाभ हेतु माही नदी पर साइफन का निर्माण करके भीखाभाई (सागवाडा़) नहर निकाली गई थी इस परियोजना से डूँगरपुर के सागवाडा़ क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।

इसका नामकरण वागड़ के स्वतंत्रता सेनानी स्व. भीखाभाई भील के नाम पर किया गया।

कडाणा बाँध-

कडाणा बाँध माही नदी पर स्थित बाँध है किन्तु यह राजस्थान में नहीं (गुजरात के महीसागर जिले में माही नदी पर स्थित है।)

माही नदी की सहायक नदियों पर अन्य योजनाएँ-

जाखम परियोजना- जाखम नदी-प्रतापगढ़

अनास परियोजना-अनास नदी-बाँसवाड़ा

सोम कागदर परियोजना- सोम नदी-उदयपुर

सोम-कमला-अम्बा परियोजना-सोम नदी-डूंगरपुर

पश्चिमी बनास नदी-

अरब सागरीय नदी तंत्र की एक प्रमुख नदी है पश्चिमी बनास नदी जिसका उद्गम नया सनवाड़ (सिरोही) के निकट अरावली की पहाड़ियों से होता है।

पश्चिमी बनास नदी पर सिरोही में पश्चिमी बनास परियोजना निर्मित है।

सिरोही में प्रवाहित होते हुए पश्चिमी बनास गुजरात के बनास कांठा जिले में प्रवेश करती है और कच्छ की खाडी़ (गुजरात) में विलुप्त हो जाती है।

इसकी एकमात्र सहायक नदी सीपू नदी है जो दक्षिण की ओर से आकर इसमें मिलती है।

गुजरात का डीसा शहर पश्चिमी बनास के किनारे स्थित है।

साबरमती नदी-

अरबसागरीय नदी तंत्र की ऐसी नदी जो राजस्थान से निकलती है पर राजस्थान में नही बहती है और यह राजस्थान में न्यूनतम प्रवाह क्षेत्र वाली नदी है।

साबरमती का उद्गम अरावली की पहाड़ियाँ (झाड़ोल-उदयपुर) से होता है और समाप्ति खंभात की खाड़ी (गुजरात) में होती है।

साबरमती नदी की कुल लम्बाई 320 किमी. है पर राजस्थान में प्रवाह क्षेत्र मात्र 28 किमी. है।

गुजरात की राजधानी-गांधीनगर तथा अहमदाबाद शहर और साबरमती आश्रम-साबरमती नदी के किनारे बसे हैं।

साबरमती नदी की सहायक नदियाँ-

मानसी, वाकल, सेई, हथमती तथा वेतरक आदि साबरमती की सहायक नदियाँ हैं।

मानसी वाकल परियोजना-

साबरमती नदी की सहायक मानसी वाकल नदियों पर राजस्थान सरकार व हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड की एक संयुक्त परियोजना मानसी वाकल परियोजना निर्मित है जिसमें 70 प्रतिशत जल का उपयोग उदयपुर शहर तथा 30 प्रतिशत जल का उपयोग हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड करता है। इस पर राजस्थान की सबसे लम्बी जल सुरंग (11.2 km) देवास जल सुरंग निर्मित है।

सेई परियोजना-

साबरमती की सहायक नदी सेई नदी पर उदयपुर में सेई परियोजना निर्मित है जिसका निर्माण जवाई बाँध में पानी की आवक बनाए रखने हेतु किया गया है।

लूनी नदी-

- लूनी नदी की कुल लम्बाई 495 किमी है जबकि राजस्थान में लूनी नदी की लम्बाई 330 किमी है।

- लूनी नदी का उद्गम नाग पहाड़, पुष्कर (अजमेर) से होता है जहाँ इसका प्रारंभिक नाम सागरमती है।

- गोविन्दगढ़ (पुष्कर) से आने वाली सरस्वती नदी मिलने के बाद इसे लूनी कहते है।

- अजमेर के नाग पहाड़ से निकलकर नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर तथा जालोर के अर्द्वशुष्क क्षेत्रों में बहकर गुजरात के ‘कच्छ का रन’ में लूनी विलुप्त हो जाती है।

लूनी नदी के अन्य नाम –

वैदिक साहित्य में – मरूद्‌वृधा

कालीदास में – अन्त: सलिला

प्रारंभिक नाम – सागरमती (अजमेर)

लवणवती नदी – लवण की मात्रा अधिक होने के कारण

आधी खारी-आधी मीठी नदी – बालोतरा (बाड़मेर) तक लूनी का पानी मीठा रहता उसके बाद लूनी नदी में लवणता की मात्रा बढ़ जाती है तो लूनी खारी हो जाती है।

लूनी नदी की विशेषताएँ –

लूनी पश्चिमी राजस्थान मरूस्थलीय प्रदेश की मुख्य नदी है।
लूनी बेसिन में प्राचीन कांप मृदा (बांगर) का विस्तार है।
लूनी नदी के प्रवाह क्षेत्र को जालोर में रेल/नेडा़ कहा जाता है।
राजस्थान का प्राचीनतम पशु मेला-मल्लीनाथ पशुमेला तिलवाडा़ (बाड़मेर) में लूनी नदी के किनारे भरता है।
अजमेर में अधिक वर्षा (अतिवृष्टि) होने पर बाड़मेर के बालोतरा में लूनी में बाढ़ आती है।
वर्तमान में लूनी नदी रंगाई छपाई उद्योग से निकलने वाले रसायन युक्त जल के कारण प्रदूषित हो रही है।
लूनी नदी तंत्र से संबंधित परियोजनाएँ-

5. जसवंतसागर बांध (पिचियाक बांध)-

लूनी नदी, बिलाडा़ (जोधपुर)

6. जवाई परियोजना:-

जवाई नदी, सुमेरपुर (पाली)
यह वृह्द श्रेणी की सिंचाई परियोजना है। जिसका संबंध पाली, बाड़मेर, जालोर, उदयपुर जिले से है।
जवाई नदी पर पश्चिमी राजस्थान का सबसे बडा बाँध जवाई बांध बना हुआ है।
जवाई बांध का निर्माण 1946-1956 के मध्य अकाल राहत कार्य के दौरान जोधपुर के महाराज उम्मेदसिंह ने करवाया था।
जवाई बांध को मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते है।
जवाई बांध में पानी की आवक बनाए रखने हेतु उदयपुर में सेई परियोजना का निर्माण किया गया
7. हेमावास बांध :-

बाण्डी नदी, हेमावास (पाली)
यहाँ जायद की फसल अधिक होती है जैसे- खरबूजा
8. बांकली बांध :-

सूकडी़ नदी- बांकली (जालोर में)

Note :-हेमावास तथा बांकली बांध दोनो मध्यम श्रेणी की सिंचाई परियोजना है।

लूनी की सहायक नदियाँ :-

लीलड़ी - लूनी में मिलने वाली पहली सहायक नदी (सोजत-पाली)

मीठड़ी - पाली

बाण्डी – राजस्थान की सबसे प्रदूषित नदी (हेमावास-पाली)

सूकडी़ – जालोर का सुवर्णिगिरी दुर्ग इसी नदी के किनारे है। (देसुरी-पाली)

जवाई – लूनी की सबसे लम्बी सहायक नदी इस पर जवाई बांध बना हुआ है। जिसे मारवाड़ का अमृत सरोवर कहते हैं।

- जवाई की सहायक नदी मथाई नदी के किनारे रणकपुर जैन मंदिर बने हुए है।

- जवाई नदी (सायला-जालोर) में खारी नदी आकर मिलती है जिसके पश्चात जवाई नदी सूकड़ी II के नाम से जानी जाती है।

सागी - जसवंतपुरा पहाडी़ (जालोर) से लूनी में सबसे अंत में मिलने वाली सहायक नदी है।

जोजडी़ – लूनी की एकमात्र ऐसी सहायक नदी जो लूनी में दांयी ओर से आकर मिलती है और जिसका उद्गम अरावली की पहाडी़ नहीं है। ये नागौर के पोडलू गांव से निकलती है।

जल संरक्षण एवं संग्रहण-बंगाल की खाड़ी नदी

वे नदियाँ जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपना जल बंगाल की खाडी़ में ले जाती हैं बंगाल की खाडी़ की नदियाँ कहलाती हैं।

राजस्थान के कुल अपवाह तंत्र का 24% भाग बंगाल की खाडी़ नदी तंत्र के अन्तर्गत आता है।

राजस्थान में सर्वाधिक नदियाँ बंगाल की खाडी़ नदी तंत्र के अन्तर्गत आती हैं।

बंगाल की खाडी़ नदी तंत्र की प्रमुख नदियाँ-








बाणगंगा नदी-

अन्य नाम- अर्जुन की गंगा, रूण्डित नदी, ताला नदी

बाणगंगा नदी का उद्गम बैराठ की पहाड़ियाँ (जयपुर) से होता है

बैराठ का प्राचीन नाम-विराट नगर था जो कि मत्स्य जनपद की राजधानी थी जहाँ से महाभारत कालीन तथा मौर्यकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।

बाणगंगा नदी के किनारे ही बैराठ सभ्यता विकसित हुई जो कि लौह युगीन सभ्यता थी।

सम्राट अशोक के काल का भाब्रू शिलालेख तथा बौद्ध स्तूप और शंख लिपि के साक्ष्य प्राप्त हुए है।

बाणगंगा नदी का प्रवाह क्षेत्र जयपुर-दौसा-भरतपुर है भरतपुर से बाणगंगा नदी (यमुना नदी-आगरा-उत्तर प्रदेश) में मिल जाती है।

भरतपुर में बाणगंगा की सहायक नदी (गंभीरी नदी) पर अजान बाँध निर्मित है जिससे भरतपुर जिले को पेयजल व सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती है।

केवलादेव घना पक्षी विहार को भी पेयजल आपूर्ति अजान बाँध से होती है।

चम्बल नदी-

बंगाल की खाडी़ नदी तंत्र की सबसे मुख्य नदी चम्बल नदी है जिसका नाम चर्मवती नदी भी है इसे ‘राजस्थान की कामधेनु’ भी कहते है।

चम्बल नदी का उद्गम जानापाव की पहाड़ियाँ-मध्यप्रदेश से होता है।

राजस्थान में चम्बल नदी प्रवेश चौरासीगढ़ (चित्तौड़) से करती है और छह जिलों से प्रवाहित होती हुई (मुरादगंज-इटावा उत्तरप्रदेश) में यमुना नदी में मिल जाती है।

चम्बल नदी का विस्तार तीन राज्यों (मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा उत्तरप्रदेश) में है।

चम्बल नदी की कुल लम्बाई 966 किमी. है पर राजस्थान में चम्बल की लम्बाई 135 किमी. है।

चम्बल नदी मध्यप्रदेश और राजस्थान के मध्य 241 किमी की सीमा बनाती है।

चम्बल नदी बूँदी-कोटा, कोटा-सवाईमाधोपुर तथा बूँदी-चित्तौड़गढ के मध्य सीमा बनाती है।

चम्बल नदी की विशेषताएँ :-

चम्बल नदी राजस्थान की एकमात्र नित्यवाही नदी है।

चम्बल नदी राजस्थkन की सबसे लम्बी नदी है।

चम्बल नदी राजस्थान में सतही जल, जल की उपलब्धता, जल की उपयोगिता की दृष्टि से सबसे बड़ी नदी है क्योंकि राजस्थान में सर्वाधिक नदियाँ चम्बल नदी तंत्र के अन्तर्गत आती है।

चम्बल नदी पर चित्तौड़गढ़ में राजस्थान का सबसे ऊँचा जलप्रपात (चूलिया जलप्रपात) स्थित है।

चम्बल नदी सर्वाधिक अवनालिका अपरदन /बीहड़/उत्खात स्थलाकृति के लिए प्रसिद्व है।

चम्बल नदी हाड़ौती के पठार की मुख्य नदी है।

चम्बल बेसिन में नवीन जलोढ़ मृदा (खादर) का विस्तार है।

चम्बल नदी से संबंधित परियोजनाएँ :-

चम्बल नदी घाटी परियोजना

यह एक बहुउद्देशीय परियोजना है जिसमें सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन प्राथमिक उद्देश्य है।

यह राजस्थान तथा मध्यप्रदेश की संयुक्त परियोजना है जिसमें दोनों की 50-50 प्रतिशत की हिस्सेदारी हैं।

प्रथम योजना काल में ही चम्बल नदी घाटी परियोजना को तीन चरणों में पूरा किया गया :-








चम्बल नदी की सहायक नदियाँ








चम्बल नदी में पश्चिम (बायीं ओर) से मिलने वाली सहायक नदियाँ -

बामनी नदी/ब्राह्मणी नदी-

बामनी नदी का उद्गम हरिपुरा की पहाड़ियाँ (चित्तौड़गढ़) से होता है और यह भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़) में चम्बल से मिलती है

चम्बल और बामनी नदी के संगम पर भैंसरोडगढ़ दुर्ग स्थित है। राजस्थान की ओर से चम्बल नदी में सबसे पहले मिलने वाली नदी बामनी नदी है।

कुराल नदी-

राजस्थान की ओर से चम्बल में मिलने वाली दूसरी नदी कुराल नदी है।

कुराल नदी का उद्गम उपरमाल के पठार (चित्तौड़) से होता है इसका प्रवाह क्षेत्र चित्तौड़, बूँदी, कोटा है तथा भैंसखाना (कोटा) में यह चम्बल नदी में मिलती हैं।

कुराल की सहायक मेज नदी है।

बनास नदी-

बनास नदी को वन की आशा भी कहा जाता है। बनास नदी पूर्णत: राजस्थान में बहने वाली सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 480 किमी/ 512 किमी है।

बनास नदी का उद्गम क्षेत्र खमनोर की पहाड़ियाँ (राजसमंद) है तथा यह छह जिलों से प्रवाहित होते हुए रामेश्वर (सवाई माधोपुर) में चम्बल नदी से मिल जाती है।

बनास बेसिन का विस्तार छह जिलों राजसमंद-चित्तौड़गढ़-भीलवाडा़-अजमेर-टोंक-सवाई माधोपुर में है और बनास बेसिन में लाल-पीली मृदा (भूरी मृदा) का विस्तार पाया जाता है।

बनास की सहायक नदियाँ-

बेड़च, मेनाल, कोठारी, खासी,डाई, मोरेल आदि बनास की सहायक नदियाँ है।

बेड़च/आहड़/आयड़ नदी

बेड़च नदी का उद्गम गोगुन्दा की पहाड़ियों (उदयपुर) से होता है तथा इसका प्रवाह क्षेत्र उदयपुर-चित्तौड़गढ़-भीलवाडा़ है।

बेड़च नदी बींगोद –भीलवाडा़ में बनास नदी में मिल जाती है।

विशेषता –

बेड़च नदी का प्रारंभिक नाम आहड़/आयड़ नदी है जो उदयसागर झील (उदयपुर) में मिलने के बाद बेड़च के नाम से जानी जाती है।

बेड़च नदी के किनारे उदयपुर में आहड़ सभ्यता (ताम्रनगरी) की खोज की गई।

बेड़च और गंभीरी नदी के किनारे चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित है।

मेनाल नदी-

मेनाल नदी का उद्गम बेंगू (चित्तौड़गढ़) से होता है तथा चित्तौड़, भीलवाडा़ में प्रवाहित होते हुए यह बनास नदी (बींगोद-भीलवाडा़) में मिल जाती है।

मेनाल नदी भीलवाडा़ में मेनाल जलप्रपात का निर्माण करती है।

कोठारी नदी-

कोठारी नदी का उद्गम दिवेर की पहाड़ियाँ (राजसमंद) से होता है तथा यह नंदराय (भीलवाडा़) में बनास नदी में मिल जाती है।

कोठारी नदी के किनारे भीलवाडा़ में बागोर सभ्यता (मध्य पाषाण कालीन) की खोज की गई जहाँ से प्राचीनतम पशुपालन के प्रमाण मिले हैं।

कोठारी नदी (भीलवाडा़) पर मेजा बाँध बना हुआ है।

खारी नदी-

खारी नदी का उद्गम बिजराल ग्राम की पहाड़ियाँ (राजसमंद) से होता है।

खारी नदी का प्रवाह क्षेत्र राजसमंद, भीलवाडा़, अजमेर, टोंक है।

देवली-टोंक में खारी नदी बनास में मिल जाती है।

खारी नदी पर अजमेर में नारायण सागर परियोजना स्थित है।

चम्बल नदी में दायीं ओर (पूर्व) से मिलने वाली सहायक नदियाँ-

पार्वती नदी-

पार्वती नदी का उद्गम सेहोर क्षेत्र (मध्य प्रदेश) से होता है राजस्थान में प्रवेश करयाहाट (बाराँ) से करती है।

पार्वती नदी पलिया ग्राम-सवाई माधोपुर में चम्बल नदी में मिल जाती है।

पार्वती नदी राजस्थान की तथा मध्यप्रदेश की दो बार सीमा बनाती है।

कालीसिंध नदी-

कालीसिंध नदी का उद्गम बागली ग्राम की पहाड़ियाँ मध्यप्रदेश से होता है।

राजस्थान में कालीसिंध नदी का प्रवेश बिन्दा (रायपुर-झालावाड़) से होता है और नानेरा-कोटा में चम्बल नदी में मिलती है

आहु तथा परवन कालीसिंध की सहायक नदियाँ है।

कालीसिंध तथा आहु के संगम पर झालावाड़ में गागरोन दुर्ग स्थित है।

कालीसिंध और परवन नदी के किनारे मनोहरथाना दुर्ग स्थित है।

परवन नदी के किनारे बाराँ जिले में शेरगढ़ दुर्ग (कोशवर्द्धन दुर्ग) स्थित है।

पूर्व से पश्चिम की ओर चम्बल में मिलने वाली सहायक नदियों का सही क्रम-

पार्वती-कुन्नु-कालीसिंध-क्षिप्रा-बामनी-कुराल-बनास

राजस्थान में पूर्व से पश्चिम की ओर चम्बल में मिलने वाली सहायक नदियों का सही क्रम-

पार्वती-कुन्नु-कालीसिंध- बामनी-कुराल-बनास


जल संरक्षण:-

जल संसाधनों का योजनाबद्ध , समुचित, विवेकपूर्ण उपयोग करना ताकि भविष्य के लिए जल को सुरक्षित रखा जा सके।
प्राचीन काल से जल संरक्षण परम्परा चली आ रही है।
भुवनदेव आचार्य की पुस्तक ‘अपराजित पृच्छा’ में बावड़ी के प्रकारों का उल्लेख मिलता हैं।
कौटिल्य की पुस्तक अर्थशास्त्र में जल प्रबंधन का उल्लेख मिलता है।
चन्द्रगुप्त मौर्य ने जूनागढ़ शिलालेख में सुदर्शन झील के निर्माण का उल्लेख मिलता है।
पृथ्वी:-

पृथ्वी का कुल क्षेत्रफल 51 करोड़ वर्ग कि.मी. है।
पृथ्वी पर जल मण्डल 70.08 प्रतिशत है जिसका कुल क्षेत्रफल 36.17 करोड़ वर्ग कि.मी. है।
पृथ्वी पर स्थल मण्डल 29.02 प्रतिशत है जिसका कुल क्षेत्रफल 14.83 करोड़ वर्ग कि.मी. है।
पृथ्वी पर जल मण्डल को पैंथालासा व स्थल मण्डल को पेंजिया कहा जाता है।
भूमध्य रेखा पृथ्वी को दो भागों में विभाजित करती है-
उत्तरी गोलार्द्ध:- 40 प्रतिशत जल मण्डल, 60 प्रतिशत स्थल मण्डल।

दक्षिणी गोलार्द्ध:- 81 प्रतिशत जल मण्डल, 19 प्रतिशत स्थल मण्डल।

जल मण्डल में महासागर, सागर, खाड़ियाँ, नदियाँ, तालाब, झीलें व अन्य जल संसाधन आते हैं।
स्थल मण्डल में महाद्वीप, स्थाकृति, पर्वत, पठार, मैदान व अन्य उच्चावच आते हैं।



राजस्थान का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.41 प्रतिशत है।
राजस्थान की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 5.5 प्रतिशत है।
राजस्थान का जल भण्डार भारत के कुल जल भण्डार का 1 प्रतिशत है।











केन्द्रीय भू-जल प्राधिकरण की दृष्टि से राजस्थान के डार्क जोन:-

वह क्षेत्र जहाँ निरन्तर दोहन से भूमिगत जल समाप्त/समाप्ति के कगार पर है।
इसमें 11 जिले व 35 ब्लॉक (खण्ड) (जयपुर, जोधपुर, बाड़मेर, जालोर, सीकर, झुंझुनूँ, नागौर, चूरू, चित्तौड़गढ़, करौली, अजमेर) को शामिल किया गया हैं।
राजस्थान में जल संरक्षण

1. परम्परागत जल संरक्षण की विधि:- इस विधि में आगोर, झालरा, टोबा, मदार, जोहड़, नाडी, खड़ीन, टांका, बावड़ी, नेष्टा, कुई, तालाब, झील शामिल हैं।

2. आधुनिक जल संरक्षण की विधि:- इस विधि के अंतर्गत रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण), शुष्क कृषि पद्धति शामिल हैं।

परम्परागत वर्षा जल संरक्षण की विधियाँ:-

आगोर/पायतन:-

घरों में वर्षा जल संग्रहण हेतु बनाया गया छोटा आँगन, आगोर या पायतन कहलाता है।
यह एक वर्षा जल संरक्षण की विधि है।
आगोर ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र में होते हैं।
यह पश्चिमी राजस्थान में देखने को मिलते हैं।
मदार:-

यह आगोर व पायतन का विस्तृत रूप हैं।
तालाब व झील में वर्षा जल संरक्षण हेतु आस-पास निर्धारित भू-सीमा का निर्धारण करना मदार कहलाता है।
मदार वर्षा जल संरक्षण एवं संग्रहण की विधि हैं।
राजस्थान का इसका विकास पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलता है।
खड़ीन:-

बालूका-स्तूप के मध्य वर्षा जल एकत्र हेतु निर्मित एनीकट को खड़ीन कहते हैं।
भारत में विशेष प्रकार की कृषि खड़ीन का संबंध राजस्थान के पश्चिमी राजस्थान में जैसलमेर से है।
15वीं शताब्दी में जैसलमेर में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा जल संरक्षण हेतु बहुउद्देश्यीय तकनीक का विकास किया गया।
पश्चिमी राजस्थान में वर्षा जल संरक्षण की बहुउद्देश्यीय तकनीक खड़ीन है।
नेष्टा/नेहटा/नेहड़/नेड़ा:-

किसी जल संरक्षण (नदी, तालाब, झील) के अतिरिक्त वर्षा जल को अन्य जल स्रोत में स्थानान्तरित करने की विधि नेष्टा कहलाती है।
नदियों में अतिरिक्त जल को नालियाँ बनाकर खेतों में पहुँचाया जाता है उस माध्यम को नेष्टा कहा जाता है।
राजस्थान में नेष्टा सर्वाधिक पश्चिमी राजस्थान में लूणी नदी के आस-पास मिलता है जो लूणी बेसिन में जालोर में लूणी नदी का प्रवाह क्षेत्र को नेड़ा कहा जाता है।
नेड़ा वर्षा संरक्षण एवं संग्रहण की विधि हैं।
झालरा:-

उच्च भूमि क्षेत्र के वर्षा जल रिसाव को संगृहीत/संरक्षित करने हेतु उच्च भूमि के पाद/तलहटी में बनाया गया कुण्ड झालरा कहलाता है।
राजस्थान में सर्वाधिक झालरा जोधपुर में है।
झालरा का स्वयं का कोई आगोर नहीं होता है।
जोहड़:-

शेखावाटी क्षेत्र में वर्षा जल संरक्षण हेतु छोटे तालाब को ‘सर’ कहा जाता है।
शेखावाटी प्रदेश में (चूरू, झुंझुनूँ, सीकर) में वर्षा जल संग्रहण एवं संरक्षण हेतु अन्त: प्रवाह क्षेत्र में बनाए गए कच्चे कुएँ को जोहड़ कहते है।
शेखावाटी क्षेत्र में पक्के कुएँ को नाड़ा कहा जाता है।
राजस्थान में परम्परागत जल संरक्षण की विधियाँ:-

नाड़ी:-

छोटे तालाब व पोखर को नाड़ी कहा जाता है।
राजस्थान में सर्वप्रथम नाड़ी का निर्माण महाराजा राव जोधा ने करवाया था।
नाड़ी का सर्वाधिक प्रचलन जोधपुर क्षेत्र में है।
टोबा:-

यह नाड़ी का विस्तृत रूप है जो अधिक गहरा तथा ऊपर से चतुर्भुजाकार या वर्गाकार होता है।
कुई/बेरी:-

तालाबों व झीलों के पास 10-12 मीटर गहरा गर्त होता है जिसमें तालाब, झील के जल का रिसाव होता रहता है, उसे कुई/बेरी कहा जाता है।
टाँका:-

घरों में जल संरक्षण हेतु निर्मित कुण्ड टाँका कहलाता है।
राजस्थान में जल सरंक्षण

राजस्थान में परम्परागत जल संरक्षण विधियों में सर्वाधिक प्रचलित विधि झीलें हैं।

राजस्थान की झीलें









(A)राजस्थान में मीठे पानी की प्राकृतिक झील-




(1) पुष्कर झील (अजमेर)

अन्य नाम – तीर्थराज, तीर्थों का मामा, हिन्दुओं का पाँचवाँ तीर्थ।
राजस्थान की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील है।
ज्वालामुखी क्रिया द्वारा निर्मित क्रेटर/कोल्डर झील का उदाहरण है।
पुष्कर झील – लोनार झील (महाराष्ट्र) के बाद भारत की दूसरी बड़ी ज्वालामुखी क्रिया से निर्मित झील है।
पुष्कर झील धार्मिक दृष्टि से सबसे पवित्र झील है। इसके किनारे वेदों को लिपिबद्ध दिया गया तथा महाभारत की रचना की गई।
महाभारत युद्ध के दौरान कौरवों-पाण्डवों का मिलन भी यही हुआ था।
विश्वामित्र की तपस्या को मेनका द्वारा पुष्कर झील के किनारे भंग किया था।
पुष्कर झील के किनारे 52 घाट स्थित है, जिसमें जनाना घाट/गाँधी घाट सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
पुष्कर झील के पास ब्रह्माजी का मंदिर, सावित्री जी का मन्दिर, रमा बैंकुठेश्वर मंदिर, भृर्तहरि की गुफा और कण्व मुनि का आश्रम है।
पुष्कर झील के किनारे कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है जिसे रंगीला मेला, कार्तिक मेला या गुब्बारों का मेला कहते है।
पुष्कर झील की स्वच्छता हेतु वर्ष 1997 में कनाडा के सहयोग सहयोग से 'पुष्कर गैप' परियोजना चलाई जा रही है।

राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम (2001) जो कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा झीलों के पुनरुद्धार, सौन्दर्यीकरण, संरक्षण तथा जल की गुणवता बढ़ाने हेतु संचालित किया जा रहा है। इसमें पुष्कर झील सहित राजस्थान की छह झीलें शामिल हैं।

(2) नक्की झील (माउण्ट आबू - सिरोही)

राजस्थान की उड़िया के पठार पर स्थित सबसे ऊँची मीठे पानी की प्राकृतिक झील, जो ज्वालामुखी क्रिया से निर्मित क्रेटर झील का उदाहरण है।
नक्की झील में टॉड रॉक (मेंढ़क के आकार की चट्टान) तथा नन रॉक (घूँघट निकाले खड़ी महिला के आकार की चट्टान) सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

नक्की झील के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण देवताओं ने नाखूनों से खोदकर किया गया।
नक्की झील को गरासिया जनजाति सबसे पवित्र स्थल मानती है।
नक्की झील के किनारे रघुनाथ जी का मंदिर, हाथी गुफा चम्पा गुफा, राम झरोखा आदि स्थान है।
(3) कोलायत झील (बीकानेर)

कार्तिक पूर्णिमा को कोलायत झील के किनारे कपिल मुनि का प्रसिद्ध मेला भरता है।
पीपल के वृक्षों की अधिकता के कारण इसे शुष्क मरुस्थल का सुन्दर मरु उद्यान कहते हैं।
(4) गजनेर झील (बीकानेर)

राजस्थान की एकमात्र झील जो दर्पण के समान प्रतीत होती है। (प्रतिबिंब में गजनेर महल दिखाई देता है) गजनेर झील के पास ही गजनेर अभयारण्य बना है जो कि बटबड़ पक्षी के लिए प्रसिद्ध है।

(5) तलवाड़ा झील – हनुमानगढ़

(6) तालछापर झील - चूरु

(7) नवलखा झील - बूँदी

(8) दुगारी/कनक सागर - बूँदी

(9) गैब सागर - डूँगरपुर

(10) मानसरोवर - झालावाड़

(11) कोडिला – झालावाड़

(12) पीथमपुरी – सीकर

(B) राजस्थान की मीठे पानी की कृत्रिम झीलें:-

(1) जयसमंद झील/ढेबर झील (उदयपुर):-

जयसमंद झील भारत की दूसरी सबसे बड़ी मीठे पानी की कृत्रिम झील है। (पहली गोविन्दसागर झील-हिमाचल प्रदेश)।
यह राजस्थान की पहली कृत्रिम झील है। इसका निर्माण मेवाड़ महाराणा जयसिंह ने (1685-1691 ई.) करवाया था।
इसका निर्माण (गोमती नदी/झुमरी नदी) को रोककर करवाया गया।
जयसमंद झील को ढेबर झील भी कहते हैं।
जयसमंद झील के पूर्व में स्थित कटा-फटा लसाड़िया का पठार है।
जयसमंद झील में 7 टापू हैं जिनमें सबसे बड़ा टापू-बाबा का मगरा/बाबा का भांगड़ा तथा सबसे छोटा टापू प्यारी है।
जयसमंद झील के पास रूठी रानी का महल, चित्रित हवामहल, हाथी की पाषाण मूर्ति है
जयसमंद झील से श्यामपुर तथा भाट नामक 2 नहरें निकाली गई हैं।
(2) राजसमंद झील (राजसमंद):-

राजसमंद झील का निर्माण महाराणा राजसिंह ने 1662 ई. में कांकरोली (नाथद्वारा) में गोमती, ताल तथा केलवा नदियों के पानी को रोककर करवाया।
घेवर माता द्वारा नींव रखी जाने के कारण राजसमंद झील के किनारे घेवर माता का मंदिर है।
राजसमंद झील के किनारे नौ चौकी की पाल पर विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति – (राज प्रशस्ति) 25 शिलालेखों पर संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण हैं।
राज प्रशस्ति के लेखक रणछोड़ भट्ट हैं।
राज प्रशस्ति में मुगल-मेवाड़ संधि का भी उल्लेख है।
(3) पिछोला झील (उदयपुर):-

पिछोला झील का निर्माण (1387 ई.) में राणा लाखा के समय पिच्छू बंजारा द्वारा पिछोला गाँव (उदयपुर) में करवाया गया।
पिछोला झील में शिशरमा नदी का जल आता है।
पिछोला झील में दो महल बने हुए हैं।
(1) जग मंदिर महल:-

पिछोला झील में एक टापू पर बने जग मंदिर महल को ताजमहल का पूर्वगामी कहा जाता है।
इसका निर्माण महाराणा कर्णसिंह ने प्रांरभ करवाया था किन्तु इसका कार्य पूरा महाराणा जगतसिंह प्रथम ने करवाया था।
शाहजहाँ (खुर्रम) ने दक्षिण दौरे के समय यहाँ शरण ली थी और जग मंदिर महल को देखकर ही शाहजहाँ को ताजमहल बनाने की प्रेरणा मिली।
1857 ई. की क्रांति के दौरान महारणा स्वरूप सिंह ने अंग्रेजों को शरण दी थी।
पिछोला झील – राजस्थान की पहली झील है जहाँ सौर ऊर्जा संचालित नौका चलाई जा रही है।
(2) जगनिवास महल – इस महल का निर्माण महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने करवाया था।

(4) फतेह सागर झील –उदयपुर:-

फतेह सागर झील का निर्माण (1680 ई.) में महाराणा जयसिंह द्वारा देवली तालाब के रूप में करवाया गया।
1888/1889 ई. में महाराणा फतेह सिंह द्वारा इसका पुनर्निर्माण करवाया गया।
फतेह सागर झील की नींव अंग्रेज अधिकारी ड्यूक ऑक कनॉट द्वारा रखी गई। इसीलिए फतेह सागर पर बने बाँध का नाम कनॉट बाँध रखा है।
फतेह सागर के सबसे बड़े टापू पर नेहरू उद्यान, दूसरे टापू पर सौर वैधशाला और सबसे छोटे टापू पर जेट माउण्टेन स्थित है।
भारत की सबसे बड़ी सौर वैधशाला फतेहसागर झील में लगी है।
फतेहसागर झील को पिछोला झील से स्वरूप सागर नहर जोड़ती है, जिस पर ‘नटनी का चबूतरा’ बना है।
(5) आनासागर झील (अजमेर):-

आनासागर झील का निर्माण अजमेर चौहान शासक अर्णोराज द्वारा (1137 ई.) तुर्की सेना के रक्त से रंगी धरती को साफ करने हेतु करवाया गया।
जहाँगीर ने आनासागर झील के किनारे दौलतबाग (सुभाष उद्यान) का निर्माण करवाया था।
यहाँ पर जहाँगीर ने टॉमस रो से मुलाकात की थी। शाहजहाँ ने आनासागर झील पर बारहदरी का निर्माण करवाया। (पूर्णत: संगमरमर से बनी)
(6) फॉय सागर झील (अजमेर):-

फॉय सागर झील का निर्माण अकाल राहत कार्य के दौरान अंग्रेज अधिकारी फॉय के निर्देशन में हुआ था।

(7) बाल समन्द झील- जोधपुर:-

बाल समन्द झील का निर्माण गुर्जर प्रतिहार शासक बालक राव (बाऊक) ने करवाया था।

(8) कायलाना झील – जोधपुर:-

इसका निर्माण जोधपुर के महाराजा सर प्रताप सिंह ने अकाल राहत कार्य के दौरान करवाया था।

(9) सिलीसेढ़ झील –अलवर:-

सिलीसेढ़ झील का निर्माण अलवर के महाराजा विनय सिंह ने करवाया था।

(10) जैत सागर –बूँदी

(11) राम सागर – धौलपुर

(12) तालाब शाही – धौलपुर

(13) तेज सागर – प्रतापगढ़

(14) मूल सागर – जैसलमेर

(15) अमर सागर - जैसलमेर

(16) गजरूप सागर – जैसलमेर

(17) गढ़सीसर – जैसलमेर

(18) पन्नाशाह तालाब – झुंझुनूँ

राजस्थान की खारे पानी की झीलें

उत्तर पश्चिम राजस्थान में मुख्यत: खारे पानी की झीलें पाई जाती है जो कि ‘टेथिस सागर’ का अवशेष है।

(1) कावोद झील – जैसलमेर:-

राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ नमक उत्पादन झील है।

(2) लूणकरणसर झील – बीकानेर:-

राजस्थान/भारत की उत्तरतम खारे पानी की झील है।

(3) डीडवाना – नागौर:-

इस झील के नमक में सोडियम सल्फेट ज्यादा पाया जाता है। अत: इस झील का नमक खाने योग्य नहीं होता है।

इस झील का नमक चमड़ा उद्योग तथा रंगाई छपाई उद्योग में

काम आता है।

राजस्थान सरकार द्वारा डीडवाना में सोडियम सल्फेट बनाने का कारखाना लगाया है, जिसका उपयोग कृत्रिम कागज बनाने में किया जाता है।

(4) पचपदरा झील - बाड़मेर:-

इस झील का नमक सर्वाधिक खाने योग्य होता है क्योंकि इसमें Nacl – 98% होता है और 2% आयोडीन पाया जाता है।
पचपदरा झील में नमक खारवाल जाति के लोग मोरड़ी/मोरली झाड़ी का उपयोग करके बनाते हैं।
(5) सांभर झील:-

सांभर झील भारत में सबसे बड़ी आंतरिक नमक उत्पादनझील है।
यह भारत के कुल नमक का 8.7% नमक उत्पादित करती है।
सांभर झील में एल्गी/शैवाल/बैक्टीरिया पाया जाता है, जिसका उपयोग नाइट्रोजनयुक्त खाद बनाने में किया जाता है।
सांभर झील का निर्माण शाकम्भरी के चौहान शासक ‘वासुदेव चौहान’ ने 551ई. करवाया था।
सांभर झील रामसर साइट की सूची में भी शामिल है।
सांभर झील तीन जिलों में आती हैं – जयपुर, नागौर एवं अजमेर
राजस्थान का सबसे निम्नतम बिन्दु है।
सांभर झील में नमक क्यार पद्धति से लिकाला जाता है।
सन् 1960 में राजस्थान सरकार द्वारा सांभर साल्ट लिमिटेड की स्थापना की गई थी।
वर्ष 1964 में यह भारत सरकार के अधीन आ गई और इसका नाम ‘हिन्दुस्तान सांभर साल्ट लिमिटेड’ कर दिया गया।
सांभर झील में उत्तरी एशिया से पक्षी आते हैं, जिन्हें फ्लेमिंगो कहते हैं।
हाल ही में सांभर झील में फ्लेमिंगो पक्षियों के मरने का कारण ब्यूटोलिज्म/बोटुलिज्म रोग है।
सांभर झील की लम्बाई 32 कि.मी.. और चौड़ाई 12 कि.मी.. है।
राजस्थान में जल संरक्षण

परम्परागत जल संरक्षण विधियाँ

(1) तालाब

राजस्थान में प्राचीन समय से ही तालाबों का प्रचलन जल संरक्षण जल सरंक्षण हेतु होता आ रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संरक्षण हेतु वर्षा के जल को निचले गर्त के एक सिरे पर बांध अथवा दीवार बनाकर पानी को एकत्र कर लिया जाता है वह तालाब कहलाता है।
कुछ स्थानों पर प्राकृतिक गर्तों में पानी एकत्र हो जाने पर वे स्वत: ही तालाब का रूप ले लेते हैं।
वर्तमान में शहरीकरण, औद्योगिक विकास तथा जनसंख्या के दबाव के कारण तालाबों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है।
राजस्थान में सामान्यत: दक्षिण एवं दक्षिण पूर्वी जिलों में तालाबों की संख्या सर्वाधिक है।
राजस्थान में तालाबों से सर्वाधिक सिंचाई-उदयपुर रीजन अर्थात‌् दक्षिणी राजस्थान में होती है।
सर्वाधिक सिंचाई तालाबों द्वारा भीलवाडा-उदयपुर-डूंगरपुर-बांसवाड़ा में होती है।
तालाबों द्वारा न्यूनतम सिंचाई जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर अर्थात पश्चिमी राजस्थान क्षेत्र में होती है।
राजस्थान के प्रमुख तालाब

1.

गढ़सीसर तालाब

जैसलमेर

2.

बारेठा तालाब

भरतपुर

3.

एडवर्ड सागर

डूंगरपूर

4.

कीर्ति मोरी तालाब

बूंदी

5.

हिण्डोली तालाब

बूंदी

6.

तेजसागर तालाब

प्रतापगढ़

7.

मुरलिया तालाब

चितौड़गढ़

8.

वानकिया तालाब

चितौड़गढ़

9.

सोनापानी तालाब

चितौड़गढ़

10.

पदमिनी तालाब

चितौड़गढ़

11.

सरेरी तालाब

भीलवाड़ा

12.

बड़ी तालाब

उदयपुर

13.

पन्ने शाह का तालाब

झुंन्झुनूँ

14.

तालाब शाही

धौलपुर

15.

लाखोटिया तालाब

पाली

16.

काला सागर तालाब

सवाईमाधोपुर

17.

सुख सागर तालाब

सवाईमाधोपुर

18.

जंगली तालाब

सवाईमाधोपुर

2. बावड़ी (वापी)

राजस्थान में बावड़ियों का निर्माण प्राचीन काल से किया जा रहा है।
यह एक जलकुण्ड होता है जिसमें जल की सतह तक जाने के लिये चारों ओर कई सीढ़ियाँ बनी होती है।
बावड़ी निर्माण का उद्देय जल संरक्षण एवं पुण्य प्राप्ति होता था।
अनेक राजाओं ने अपने महलों और विभिन्न स्थानों पर कई सुन्दर बावड़ियों का निर्माण करवाया था जो कलात्मक भी होती थी।
शेखावाटी की बावड़ियाँ, बूँदी की बावड़ियाँ तथा आभानेरी-दौसा की चाँद बावड़ी अपनी स्थापत्य कला के लिये प्रसिद्ध है।
बूँदी को बावड़ियों का शहर/सिटी ऑफ स्टेप वेल्स कहा जाता है।
वास्तुशास्त्र पर आधारित अपनी पुस्तक ‘अपराजितपृच्छा’ में भुवनदेवाचार्य ने बावड़ियों के चार प्रकारों का उल्लेख किया हैं।
(1) नंदा बावड़ी-

इस प्रकार की बावड़ी का निर्माण मनोकामना पूर्ण करने हेतु करवाया जाता था।
इस बावड़ी में एक ओर द्वार तथा तीन कूट बने होते हैं।

(2) भद्रा बावड़ी-

यह सबसे सुंदर बावड़ी होती है इसमें दो द्वार तथा तथा छ: कूट बने होते है।

(3) जया बावड़ी-

तीन द्वार तथा नौ कूट निर्मित बावड़ी

(4) सर्वतोमुख बावड़ी-

चार द्वार तथा बारह कूट निर्मित बावड़ी

राजस्थान की प्रमुख बावड़ियाँ

1.

चाँद बावड़ी

आभानेरी-दौसा

2.

लवाण बावड़ी

दौसा

3.

रानी जी की बावड़ी

बूंदी

4.

भावल देवी की बावड़ी

बूंदी

5.

काकी जी की बावड़ी

बूंदी

6.

नौलखा बावड़ी

डूंगरपूर

7.

त्रिमुखी बावड़ी

उदयपुर

8.

मांजी की बावड़ी

आमेर (जयपुर)

9.

तापी बावड़ी

जोधपुर

10.

जालप बावड़ी

जोधपुर

11.

कातना बावड़ी

ओसिया- जोधपुर

12.

एक चट्‌टान की बावड़ी

मण्डोर- जोधपुर

नोट

आभानेरी-दौसा की चाँद बावड़ी विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी है-जिसकी तह तक पहुंचने हेतु लगभग 1300 सीढ़ियाँ बनायी गयी जो एक भूल भूलैया के रूप में बनी होने के कारण इसे तिलस्मा बावड़ी भी कहा जाता है।
इस बावड़ी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार काल में निकुंभ क्षत्रिय राजा चंद्र ने करवाया था।
आधुनिक जल संरक्षण की विधियाँ-

(A) रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण)

वर्षा जल संग्रहण की यह सबसे आधुनिक विधि है राज्य में जल की कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने वर्षा जल संग्रहण हेतु 300 वर्ग मीटर क्षेत्र से अधिक आवास परिसरों, संस्थानों, प्रतिष्ठानों, होटलों आदि पर इस सिस्टम को लगाना अनिवार्य कर दिया है।
रेन वॉटर हार्वेस्टिंग द्वारा निम्नलिखित प्रकार से वर्षा के जल का संचयन किया जा सकता है-
(1) वर्षा जल को सीधे जमीन से उतारना

(2) खाई बनाकर रिचार्जिंग करना

(3) कुओं में पानी उतारना

(4) ट्यूबवेल में पानी उताररा

(5) टैंक में पानी जमा करना

(B) शुष्क कृषि पद्धति

शुष्क कृषि- गैर सिंचित शुष्क भूमि पर कृषि तकनीक है जो वर्षा जल को रोकने, मिट्टी की नमी के वाष्पीकरण को दबाकर, मिट्‌टी में पानी को भंडारित करने और पानी का प्रभावी उपयोग करने की तकनीक है।
शुष्क कृषि पद्धति में फव्वारा पद्धति तथा बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति का प्रयोग कर वर्षा जल का सदुपयोग किया जाता है।
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