Rajasthan Animal Husbandry GK


Sunday, May 2, 2021

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पशु सम्पदा

पशुगणना:-

प्रत्येक पाँच वर्ष बाद राज्य में पशुगणना राजस्व मडंल द्वारा की जाती रही है जबकि इस बार 20वीं पशुगणना का कार्य राजस्व मण्डल (अजमेर) व पशुपालन निदेशालय (जयपुर) द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी ।

प्रथम पशुगणना वर्ष 1919 में की गई।

स्वतंत्रता के पश्चात् पहली पशुगणना वर्ष 1951 में की गई।

19वीं पशुगणना 2012 में की गई थी।

नवीनतम 20वीं पशुगणना 2019 में हुई थी।

20वीं पशुगणना की शुरुआत 1 अक्टूबर, 2018 को की गई।

20वीं पशुगणना पूर्णरूप से डिजिटल पशुगणना थी।

2019 की पशुगणना में दो राज्य प्रशासन (State Admin) बनाए गए जिसमें-

राजस्व मण्डल (अजमेर)

पशुपालन निदेशालय (जयपुर)

20वीं पशुगणना में प्रत्येक जिले में पशुगणना अधिकारी के रूप में जिला कलेक्टर को नियुक्त किया गया।

20वीं पशुगणना के आँकडे़ का प्रकाशन 16 अक्टूबर, 2019 में किया गया।

20वीं पशुगणना के आँकडे़ -


पशुधन की दृष्टि से देश में राजस्थान का द्वितीय स्थान है (प्रथम स्थान उत्तर प्रदेश)।

20वीं पशु गणना के अनुसार राज्य में कुल पशु सम्पदा 56.8 मिलियन है।

19वीं पशुगणना के अनुसार राज्य में कुल सम्पदा 57.7 मिलियन है।

वर्ष 2012 के सापेक्ष वर्ष 2019 में कुल पशु सम्पदा में 1.66 प्रतिशत की कमी आई है।

2007 की 18वीं पशुगणना प्रथम बार पशुओं की नस्ल के आधार पर की गई।

गौवंश -


2019 की पशुगणना में राजस्थान में गौवंश 13.9 मिलियन हैं और गौवंश की दृष्टि से देश में छठा स्थान है।

2012 की 19वीं पशुगणना में गौवंश की संख्या 13.8 मिलियन थी।

19वीं पशुगणना के सापेक्ष 20वीं पशुगणना में 4.41 प्रतिशत गौवंश में वृद्धि हुई है।

भैंस -


20वीं पशुगणना में राजस्थान में भैंस की संख्या 13.7 मिलियन हैं और भैंस की दृष्टि में देश में दूसरा स्थान है।

19वीं पशुगणना में भैंस की संख्या 13.0 मिलियन थी।

2012 की पशुगणना की तुलना में 2019 की पशुगणना में भैंस में 5.53 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

भेड़ -


राजस्थान में 2019 की पशुगणना के अनुसार भेड़ों की संख्या 7.9 मिलियन है।

भेड़ों की दृष्टि से राजस्थान का देश में चौथा स्थान है।

वर्ष 2012 की पशुगणना में भेड़ों की संख्या 9 मिलियन थी।

वर्ष 2012 की तुलना में वर्ष 2019 की पशुगणना में भेड़ों की संख्या में 12.95 प्रतिशत की कमी आई है।

बकरी -


2019 की पशुगणना के अनुसार बकरियों की संख्या 20.84 मिलियन हैं।

बकरियों की दृष्टि से राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।

वर्ष 2012 की पशुगणना में बकरियों की संख्या 21.67 मिलियन थी।

वर्ष 2012 की पशुगणना के सापेक्ष वर्ष 2019 की पशुगणना में बकरियों की संख्या में 3.81 प्रतिशत की कमी आई है।

ऊँट -


20वीं पशुगणना के अनुसार ऊँटों की संख्या 2.13 मिलियन है।

ऊँटों की दृष्टि से राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।

वर्ष 2012 की पशुगणना में ऊँटों की संख्या 3.26 मिलियन है।

वर्ष 2012 की पशुगणना की तुलना में वर्ष 2019 की पशुगणना में ऊँटों की संख्याओं में 34.69 प्रतिशत की कमी आई है।

घोड़े -


वर्ष 2019 की पशुगणना के अनुसार घोड़ों की संख्या 0.34 मिलियन हैं।

घोड़ों की दृष्टि से राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।

वर्ष 2012 की पशुगणना में घोड़ों की संख्या 0.33 मिलियन थी।

वर्ष 2012 की पशुगणना के सापेक्ष वर्ष 2019 की पशुगणना में घोड़ों की संख्या में 10.85 प्रतिशत की कमी आई है।

गधे-


2019 की पशुगणना के अनुसार गधों की संख्या 0.23 लाख मिलियन है।

गधों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।

वर्ष 2012 की पशुगणना में गधों की संख्या 0.81 लाख थी।

वर्ष 2012 की पशुगणना के सापेक्ष वर्ष 2019 की पशुगणना में गधों की संख्या में 71.31 प्रतिशत की कमी आई हैं।

राज्य में पशु सम्पदा -


राज्य में सर्वाधिक पशु सम्पदा वाले जिले बाड़मेर, जोधपुर, उदयपुर व नागौर है व सबसे कम पशु सम्पदा वाले जिले धौलपुर, कोटा, सवाई माधोपुर व बाराँ हैं।

सर्वाधिक पशु सम्पदा वाला जिला बाड़मेर है। जबकि सबसे कम पशु सम्पदा वाला जिला धौलपुर है।

ऊँट -


इसे रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है।

राजस्थान में सर्वाधिक ऊँट जैसलमेर में पाए जाते हैं।

राजस्थान में न्यूनतम ऊँट झालावाड़ में पाए जाते हैं।

राज्य में तीन स्थानों के ऊँट प्रसिद्ध हैं-

 


बीकानेरी ऊँट:- ये बीकानेर में पाए जाते हैं ये बोझा ढोने हेतु प्रसिद्ध हैं।


 


क्रं सं.


नस्ल


क्षेत्र


विशेषता


1.


राठी


श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू


- इसे राजस्थान की कामधेनू कहा जाता है।

- ये दुध उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है।

- यह लालसिंध व साहीवाल का क्रॉस है।


2.


थारपारकर


बाड़मेर व जोधपुर


मूल स्थान- सिंध (पाकिस्तान) व मालाणी (बाड़मेर)।


3.


कांकरेज


बाड़मेर व जालोर


- मूल स्थान- कच्छ का रण (गुजरात)

• जो कृषि कार्य में उपयोगी।

- बल मजबूत कद काठी के होते हैं।


4.


सांचोरी


उदयपुर, पाली, सिरोही, जालोर


• कृषि कार्यों में उपयोगी।


5


नागौरी


बीकानेर व नागौर क्षेत्र में


- ये नस्ल भारवाहक व कृषि कार्य में उत्तम होते हैं।

• उत्पत्ति स्थान- सुहालक (नागौर)

- ये दौड़ने में तेज व फुर्तीले होते हैं।


6.


गिर


अजमेर, भीलवाड़ा, राजसमंद बूँदी


- इसे अजमेरिया या रेंडा नस्ल भी कहते हैं।

• उत्पत्ति स्थान- कठियावाड़ (गुजरात)

- डेयरी उद्योग के लिए लाभदायक।


7.


मालवी


कोटा, बाराँ, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा


- मूल स्थान- मालवा (उत्तर प्रदेश)

- यह दुग्ध हेतु प्रसिद्ध है।


8.


हरियाणवी


हरियाणा का सीमावर्ती क्षेत्र


- बैल कृषि कार्य में उपयोगी होते हैं।

- इनके माथे की हड्‌डी उभरी हुई होती है।


9.


मेवाती


अलवर व भरतपुर


- इसे कोठी नस्ल भी कहते हैं।

- इसके बैल मजबूत कदकाठी के होते हैं।


2. नाचना ऊँट:- जैसलमेर में अपनी तेज चाल हेतु पूरे भारत में प्रसिद्ध है। ये BSF द्वारा पाले जाते हैं जो बॉर्डर की निगरानी हेतु उपयोग में लिया जाता है।


ऊँट को रेबारी/राईका जाति के लोग पालते हैं।

रोग- ऊँटों में सर्रा रोग सर्वाधिक होता है। सर्रा रोग होने पर पाबुजी री फड़ बाँची जाती है इसलिए पाबुजी को ऊँटों का देवता कहा जाता है।

ऊँट प्रजनन एवं अनुसंधान केन्द्र- जोहड़बीड़ (बीकानेर) में स्थित है। अब इस केन्द्र को निदेशालय बना दिया गया है। यहाँ ऊँटों की नीति व पॉलिसी बनाई जाएगी जिसमें ऊँट पालकों को ऊँट संबंधी जानकारी दी जाएगी।

Camel milk dairy- ऊँटनी का दूध मधुमेह रोग में अमृत का कार्य करता है।

जोहड़बीड़ (बीकानेर) में स्थित है।

नवीनतम डेयरी जयपुर में बनाई जा रही है।

ऊँट के गले को गोरबंध कहा जाता है।

ऊँटों की खाल पर सूक्ष्म कलाकारी की जाती है जिसे उस्ताकला कहा जाता है।

उस्ताकला, बीकानेर की प्रसिद्ध है।

उस्ताकला की प्रसिद्ध कलाकार स्व. हिसामुद्दीन उस्ता थे।

गोवंश:-


• राजस्थान में सर्वाधिक गोवंश उदयपुर में पाए जाते हैं।

• राजस्थान में न्यूनतम गोवंश धौलपुर में पाए जाते हैं।


विदेशी गोवंश:-


क्रं सं.


नस्ल


क्षेत्र


विशेषता


1.


जर्सी


अमेरिका


• छोटी उम्र में दूध देना प्रारंभ करती है।

• दूध में वसा की मात्रा 4 प्रतिशत होती है।


2.


हॉलिस्टिन


अमेरिका व हॉलैण्ड


• शरीर पर काले सफेद चक्ते।

• सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल होती है।


3.


रेड-डेन


डेनमार्क


• यह गहरे लाल रंग की होती है।

• इसके दूध में वसा की मात्रा 4 प्रतिशत होती है।


भारत की सबसे बड़ी गौशाला- पथमेड़ा (जालोर) में स्थित है और यहाँ पर गौमूत्र बैंक व गौमूत्र रिफाईनरी लगाई गई है।

राजस्थान का बजावास गाँव बैल हेतु प्रसिद्ध है।

राज्य का एकमात्र हिमकृत सीमन बैंक बस्सी (जयपुर) में स्थित है।

भैंस:-


मूर्रा नस्ल:-


यह नस्ल हरियाणा के सीमावर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है।

राजस्थान में सर्वाधिक भैंस जयपुर जिले में पाई जाती है, जबकि न्यूनतम भैंस जैसलमेर में पाई जाती है।

इस नस्ल की भैंस को कुंदी भैंस भी कहते हैं।

इस नस्ल की भैंस के सींग जलेबीनुमा होते हैं।

इसका मूल स्थान मोठगुमरी (पाकिस्तान) है।

इसका दूध उत्पादन लगभग (20-25 लीटर) होता है।

इसके दूध में सामान्यत: 7-8 प्रतिशत वसा होती है।

सूरती नस्ल:-


यह गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में पाई जाती है।

इनका मूल स्थान सूरत (गुजरात) में है।

जाफराबादी:-


यह दक्षिणी राजस्थान में पाई जाती है।

यह सर्वश्रेष्ठ मादा ताकतवर जानवर होती है।

इनका मूल स्थान गुजरात में है।

बदावरी:-


यह पूर्वी राजस्थान में पाई जाती है।

यह राजस्थान की सबसे सुन्दर नस्ल होती है।

इसके दूध में सर्वाधिक वसा की मात्रा (13 प्रतिशत) होती है।

नागौरी नस्ल:-


यह मध्यवर्ती राजस्थान में पाई जाती है।

इस नस्ल के भैंसों का उपयोग कृषि कार्य में किया जाता है।

भेड़:-


राजस्थान में सर्वाधिक मात्रा में भेड़ बाड़मेर जिले में पाई जाती हैं।

राजस्थान में न्यूनतम मात्रा में भेड़ बाँसवाड़ा जिले में पाई जाती हैं।

चोकला:-


यह नस्ल शेखावाटी क्षेत्र में पाई जाती है।

यह ऊन हेतू प्रसिद्ध नस्ल है।

इस नस्ल को भारतीय मैरिनो भी कहते हैं।

इस नस्ल को ‘द्दापर’ नस्ल भी कहते हैं।

सोनाड़ी:-


यह नस्ल दक्षिण राजस्थान में पाई जाती है।

इस नस्ल को चनोथर भी कहते हैं।

इस नस्ल की ऊन का उपयोग गलिचा निर्माण में किया जाता है।

मालपुरी:-


यह राजस्थान के टोंक, जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा जिलों में पाई जाती है।

इस नस्ल को देशी नस्ल भी कहते हैं।

इस नस्ल की ऊन का उपयोग गलिचा निर्माण में किया जाता है।

मारवाड़ी:-


यह नस्ल पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है।

इस नस्ल से वर्ष भर में सर्वाधिक मात्रा में ऊन प्राप्त होती है।

इस नस्ल की राजस्थान राज्य में 50 प्रतिशत भेड़े पाई जाती हैं।

यह लम्बी दूरी की यात्रा तय करने में सक्षम होती है।

इस नस्ल में रोग प्रतिरोधकता क्षमता सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है।

पुंगल:-


यह नस्ल राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, नागौर जिलों में पाई जाती है।

इसे स्थानीय भाषा में चोकला कहते हैं।

नाली:-


यह राजस्थान में हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिलों में पाई जाती है।

इनसे लम्बे रेशेवाली ऊन प्राप्त की जाती हैं।

खेरी:-


यह जोधपुर, नागौर व पाली जिले में पाई जाती है।

इस नस्ल के सींग हल्के होते हैं।

यह एक घुमक्कड़ नस्ल है, जिसे स्थानीय भाषा में रेवड़ कहा जाता है।

मगरा:-


यह राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, नागौर जिलों में पाई जाती है।

इस नस्ल को बीकानेरी चोकला भी कहते हैं।

जैसलमेरी:-


यह राजस्थान के जैसलमेर जिले में पाई जाती है।

इन नस्लों की भेड़ों का मुँह काला होता है।

सर्वाधिक ऊन इसी नस्ल की भेड़ों से प्राप्त होती है।

इस नस्ल से फाइन व मध्यम श्रेणी की ऊन प्राप्त होती हैं।

इसकी मध्यम सफेद ऊन गलीचा बनाने हेतु प्रयुक्त की जाती है।

विदेशी नस्ल:-


भेड़ों की रुसी नस्ल रुसी मैरीनो में पाई जाती है।

इस नस्ल को डोर्सेट, रेम्बुले, कोरिडेल नाम से जाना जाता है।

बकरी:-


बकरी को राजस्थान में गरीब की गाय कहते हैं।

इसे चलता-फिरता फ्रिज कहा जाता है।

इसके माँस को चेवण या चेवणी कहा जाता है।

यह सर्वाधिक मात्रा में बाड़मेर में पाई जाती हैं।

मारवाड़ी (लौही):-


यह पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है।

इसे माँस उत्पादन हेतु पाला जाता है।

झखराना:-


यह राजस्थान के अलवर में पाई जाती है।

यह सर्वाधिक दूध उत्पादन वाली नस्ल है।

बरबरी:-


यह पूर्वी राजस्थान में पाई जाती है।

इस नस्ल को राजस्थान में शहरी बकरी भी कहते हैं।

इस नस्ल की बकरी सबसे सुन्दर होती है।

यह नस्ल सर्वाधिक प्रजनन क्षमता हेतु सक्षम होती है।

शेखावाटी:-


यह शेखावाटी क्षेत्र की बीना सींग वाली बकरी होती है।

इस नस्ल की बकरी को मोढ़ी बकरी कहते है।

इसे काजरी द्वारा विकसित किया गया है।

जमनापुरी:-


यह नस्ल हाड़ौती क्षेत्र में पाई जाती है।

इस नस्ल को माँस प्राप्ति एवं दूध हेतु पाला जाता है।

परबतसरी:-


यह नस्ल नागौर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में पाई जाती है।

इस नस्ल को माँस प्राप्ति हेतु पाला जाता है।

बकरी विकास एवं चारा उत्पादन परियोजना:-


इस परियोजना का प्रारंभ वर्ष 1981-82 में रामसर (अजमेर) से हुआ।


इस परियोजना को स्विजरलैंड के सहयोग से प्रारंभ किया गया।


घोड़े:-


आलम जी का धोरा राजस्थान के बाड़मेर में स्थित है जो घोड़ों का तीर्थं स्थल के नाम से जाना जाता है।

अश्व प्रजनन केन्द्र जोहड़बीड़ (बीकानेर) में स्थित है।

यह सर्वाधिक मात्रा में बीकानेर जिले में पाए जाते हैं।

यह न्यूनतम मात्रा में डूँगरपुर जिले में पाए जाते हैं।

इसमें तीन प्रकार की नस्लें पाई जाती हैं-

मारवाड़ी नस्ल:-


इस नस्ल का प्रजनन केन्द्र केरू (जोधपुर) में स्थित है। 


मालाणी नस्ल:-


यह नस्ल बाड़मेर जिले में सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है।

इनका प्रजनन केन्द्र डूण्डलोद (झुंझुनूँ) में स्थित है।

कठियावाड़ी नस्ल:-


 यह गुजरात राज्य में पाए जाते है।

इस नस्ल के घोड़ें घुड़सवारी के लिए सबसे अच्छी नस्ल है।

इस नस्ल के घोडे़ं सिर अरबी घोड़ें के समान होता है।

गधे:-


यह सर्वाधिक मात्रा में राजस्थान के बाड़मेर जिले में पाए जाते हैं एवं न्यूनतम मात्रा में टोंक जिले में पाए जाते हैं।

गधों का मेला प्रतिवर्ष लुणियावास (जयपुर) में आयोजित किया जाता है।

इनकी पूजा शितला माता की सवारी के रूप में की जाती हैं।

गर्दभ अभयारण्य चिकित्सा केन्द्र डूण्डलोद (झुंझुनूँ) में स्थित है।

मुर्गियाँ:-


देशी मुर्गियाँ सर्वाधिक मात्रा में बाँसवाड़ा जिले में पाई जाती हैं।

फॉर्मिंग मुर्गियाँ सर्वाधिक मात्रा में अजमेर में पाई जाती हैं और अजमेर को अण्डों की टोकरी कहा जाता है।

राज्य का कुक्कड़ फार्म जयपुर में स्थित है।

कड़कनाथ योजना बाँसवाड़ा में शुरू की गई है।

मछली:-


मछलियाँ सर्वाधिक मात्रा में उदयपुर जिले में पाई जाती है।

मछली अभयारण्य बड़ी तालाब (उदयपुर) में स्थित है।

प्रथम वर्चुअल फिश एक्वेरियम उदयपुर में स्थित है।

रंग-बिरंगी मछलियाँ बीसलपुर बाँध (टोंक) में मिलती हैं।

पक्षी चिकित्सालय जौहरी बाजार (जयपुर) में स्थित है।                                                            

रोग:-


          विषाणु


        जीवाणु


पशुमाता रोग- सभी जानवरों में


लंगड़ा बुखार- सभी जानवरों में।


खुरपका-मुहँपका रोग- गाय में।


फड़कीया रोग- भैड़ों में


गलघोटू रोग- सभी पशुओं में


ग्लेन्डर्स रोग- घोड़ों में


शीप पॉक्स रोग- भैड़ व बकरीयों में


 


राज्य में:-


केन्द्रीय भेड़ अनुसंधान का केन्द्र अविकानगर (टोंक) में स्थित है।

भेड़ और ऊन प्रशिक्षण संस्थान जयपुर में स्थित है।

भैंस अनुसंधान केन्द्र वल्लभनगर (उदयपुर) में स्थित है।

केन्द्रिय बकरी अनुसंधान केन्द्र अविकानगर (टोंक) में स्थित है।

राजस्थान में पशुधन नि:शुल्क दवा योजना 15 अगस्त, 2012 से प्रारंभ की गई है।

राजस्थान में गोपाल योजना 2 अक्टूबर, 1990 से प्रारंभ की गई।

राजस्थान में भामाशाह पशु बीमा योजना 23 जुलाई, 2016 से प्रारंभ की गई।

ऊँट प्रजनन प्रोत्साहन योजना 2 अक्टूबर, 2016 से प्रारंभ की गई।

राजस्थन पशुधन विकास बोर्ड की स्थापना 25 मार्च, 1998 को की गई।

राजस्थान में अविका कवच योजना वर्ष 2004-05 में भेड़ की मृत्यु एवं भेड़ की विकलांगता के लिए की गई।

अविकापालक जीवन रक्षक योजना वर्ष 2005 में प्रारंभ की गई।