राजस्थान नामकरण Rajasthan Name history


Saturday, March 27, 2021

 वर्तमान राजस्थान के लिए पहले किसी एक नाम

का प्रयोग नहीं मिलता है। इसके भिन्न-भिन्न क्षेत्र

अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। वर्तमान बीकानेर

और जोधपुर का क्षेत्र महाभारत काल में ‘जांगल देश’

कहलाता था। इसी कारण बीकानेर के राजा स्वयं को

‘जंगलधर बादशाह’ कहते थे। जांगल देश का निकटवर्ती

भाग सपादलक्ष (वर्तमान अजमेर और नागौर का मध्य भाग)

कहलाता था, जिस पर चैहानों का अधिकार था। अलवर

राज्य का उत्तरी भाग कुरु देश, दक्षिणी और पश्चिमी मत्स्य

देश और पूर्वी भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था। भरतपुर

और धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग

शूरसेन देश के अन्तर्गत थे। शूरसेन राज्य की राजधानी

मथुरा, मत्स्य राज्य की विराटनगर और कुरु राज्य की

इन्द्रप्रस्थ थी। उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम ‘शिव’ था,

जिसकी राजधानी ‘मध्यमिका’ थी। आजकल ‘मध्यमिका’

(मज्झमिका) को नगरी कहते हैं। यहाँ पर मेव जाति का

अधिकार रहा, जिस कारण इसे मेदपाट अथवा प्राग्वाट भी

कहा जाने लगा। डूँगरपुर, बाँसवाड़ा के प्रदेश को वाॅगड़

कहते थे। जोधपुर के राज्य को मरु अथवा मारवाड़ कहा

जाता था। जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुर्जरत्रा कहते थे 

और सिरोही के हिस्से को अर्बुद (आबू) देश कहा जाता था।

जैसलमेर को माड तथा कोटा और बूँदी को हाड़ौती पुकारा

जाता था। झालावाड़ का दक्षिणी भाग मालव देश के अन्तर्गत

गिना जाता था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस भू-भाग को आजकल

हम राजस्थान कहते है, वह किसी विशेष नाम से कभी

प्रसिद्ध नहीं रहा। ऐसी मान्यता है कि 1800 ई. में सर्वप्रथम

जाॅर्ज थाॅमस ने इस प्रान्त के लिए ‘राजपूताना’ नाम का

प्रयोग किया था। प्रसिद्ध इतिहास लेखक कर्नल जेम्स टाॅड

ने 1829 ई. में अपनी पुस्तक ‘एनल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज

आॅफ राजस्थान’ में इस राज्य का नाम ‘रायथान’ अथवा

‘राजस्थान’ रखा। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो इस राज्य

का नाम ‘राजस्थान’ स्वीकार कर लिया गया।