राजस्थान की ऐतिहासिक सभ्यताएं पृष्ठभूमि Historical background of Rajasthan Gk


Saturday, March 27, 2021





राजस्थान की ऐतिहासिक सभ्यताएं

इतिहास को प्रागैतिहासिक काल, आद्य ऐतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल में विभाजित किया जाता है।
- ऐसा काल जिसके संबंध में मानव के इतिहास के बारे में कोई लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं होती है उसे प्रागैतिहासिक काल कहते हैं।
- ऐसा काल जिसके संबंध में लिखित सामग्री उपलब्ध है लेकिन जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है उसे आद्यऐतिसाहिक काल कहते हैं। जैसे- सिन्धुघाटी सभ्यता।
- ऐसा काल जिसके संबंध में प्राप्त लिखित सामग्री को पढ़ा जा सकता है उसे ऐतिहासिक काल कहते हैं।

राजस्थान की प्रमुख सभ्यताएँ :-



क्र. सं.

सभ्यता

जिला

नदी


1.

कालीबंगा

हनुमानगढ़

सरस्वती (घग्घर)


2.

आहड़

उदयपुर

आयड़ (बेड़च)


3.

गिलूण्ड

राजसमन्द

बनास


4.

बागोर

भीलवाड़ा

कोठारी


5.

बालाथल

उदयपुर

बेड़च


6.

गणेश्वर

सीकर

कांतली


7.

रंगमहल

हनुमानगढ़

सरस्वती (घग्घर)


8.

ओझियाना

भीलवाड़ा

खारी


9.

नोह

भरतपुर

रूपारेल


10.

नगरी

चित्तौड़गढ़

बेड़च


11.

जोधपुरा

जयपुर

साबी


12.

सुनारी

झुँझुनूँ

कांतली


13.

तिलवाड़ा

बाड़मेर

लूनी


14.

रैढ़

टोंक

ढील


15.

गरदड़ा

बूँदी

छाजा


16.

बैराठ

जयपुर

बाणगंगा


17.

कोकानी

कोटा

परवन


18.

बल्लू खेड़ा

चित्तौड़

गंभीरी


राजस्थान के अन्य पुरातात्त्विक स्थल :-



क्र. सं.

पुरातात्त्विक स्थल

जिला


1.

कुराड़ा

नागौर


2.

साबणिया

बीकानेर


3.

एलाना

जालौर


4.

झाडोल

उदयपुर


5.

मलाह

भरतपुर


6.

चीथवाड़ी

जयपुर


7.

कोल माहोली

सवाईमाधोपुर


8.

नन्दलालपुरा

जयपुर


9.

बूढ़ा पुष्कर

अजमेर


10.

पिण्ड-पांडलिया

चित्तौड़


11.

चक-84

श्रीगंगानगर


12.

तरखानवाला

श्रीगंगानगर


13.

नैनवा

बूँदी


14.

धौली मगरा

उदयपुर


15.

पुंगल

बीकानेर


16.

किराड़ोत

जयपुर


17.

एकलसिंहा

अजमेर


18.

बासमबसई

अलवर


19.

वरमाण

सिरोही


20.

बड़ोपल

हनुमानगढ़


21.

बरोर

श्रीगंगानगर


22.

सीसोल

बूँदी


23.

कुण्डा व ओला

जैसलमेर

(मध्य पाषाणकालीन)


24.

तिपटियाँ

कोटा


25.

डडीकर

अलवर


26.

डाडाथोरा

बीकानेर

(लघु पाषाणकालीन)


27.

जहाजपुर

भीलवाड़ा

(महाभारत कालीन)


28.

दर

भरतपुर (पाषाणकालीन)


29.

कोटड़ा

झालावाड़


30.

जायल

नागौर

(पुरा पाषाणकालीन)


31.

खुरड़ी

परबतसर (नागौर)


32.

खानपुरा

झालावाड़


33.

चन्द्रावती

झालावाड़


34.

पीलीबंगा

हनुमानगढ़


35.

थेहड़

हनुमानगढ़


36.

लाछूरा

भीलवाड़ा


37.

आलनीया

कोटा


38.

भरनी

टोंक


39.

मरमी गाँव

चित्तौड़गढ़


40.

अहेड़ा

अजमेर


41.

सुखपुरा

टोंक


42.

रेलावन

बारां


राजस्थान का पाषाण काल :-
- राजस्थान में इस समय के आदिमानव द्वारा प्रयुक्त जो प्राचीनतम पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं वे लगभग डेढ़ लाख वर्ष पुराने हैं।
- राज्य में इस काल के बनास, बेड़च, गम्भीरी एवं चंबल आदि नदियों की घाटियों तथा इनके समीपवर्ती स्थानों से प्रस्तरयुगीन मानव के निवास करने के प्रमाण मिलते हैं।
पुरापाषाण काल :-
- इस काल में मनुष्य द्वारा पत्थर के खुरदरे औजार प्रयोग में लिए जाते थे।
- ई. 1870 में सी.ए. हैकर ने जयपुर व इन्द्रगढ़ में ‘हैण्डएक्स’, ‘एश्यूलियन’ व ‘क्लीवर’ नामक औजारों की सर्वप्रथम खोज की।
- प्रारम्भिक पाषाणकालीन स्थल :- ढिंगरिया (जयपुर), मानगढ़, नाथद्वारा, हम्मीरपुर (भीलवाड़ा), मण्डपिया (चित्तौड़), बींगौद (भीलवाड़ा) एवं देवली (टोंक)।
- इस काल में मानव के राजस्थान में जयपुर, इन्द्रगढ़, अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, जालोर, पाली, जोधपुर आदि जिलों में विस्तृत होने के प्रमाण मिले हैं।
- राजस्थान के विराटनगर, भानगढ़ तथा ढिगारिया आदि स्थानों से ‘हैण्डएक्स’ संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- विराटनगर में शैलाश्रयों एवं प्राचीन गुफाओं से पुरापाषाण काल से उत्तरपाषाण कालीन सामग्री प्राप्त हुई है।
- विराटनगर के शैलाश्रयों में चित्र प्राप्त नहीं हुए है जबकि भरतपुर जिले के दर नामक स्थान से कुछ चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं जिसमें मानव आकृति, व्याघ्र, बारहसिंगा तथा सूर्य आदि का चित्रण मिला है।
- बी.ऑलचिन ने पश्चिमी राजस्थान में लूणी नदी के किनारे तथा जालोर जिले के बालू के टीलों में पाषाणयुगीन उपकरणों की खोज की।
- पुरापाषाण कालीन मानव का भोजन कंदमूल, फल, मछली तथा शिकार से प्राप्त वन्यजीव थे।
- इस समय मानव आग जलाना सीख चुका था लेकिन पहिये का आविष्कार अभी तक नहीं हुआ था।
- इस काल में पत्थर से निर्मित उपकरण एवं हथियार चित्तौड़गढ़ में बामनी नदी के तट पर भैंसरोड़गढ़, नवाघाट से, बेड़च एवं गम्भीरी नदी के तट पर खोर, नगरी, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी आदि से, बनास नदी के तट पर एवं भीलवाड़ा में जहाजपुर, बीगोद, देवली, हम्मीरगढ़, खुरियास, मंगरोप, कुंवारिया, गिलूंड आदि से, जोधपुर जिले में लूणी नदी के तट से, गुहिया और बांडी नदी की घाटी में सिंगारी तथा पाली से, मारवाड़ में शिकारपुरा, समदड़ी, पीचक, भांडेल, सोजत, धनेरी, धुंधाड़ा, पीपाड़ एवं उम्मेदनगर से, झालावाड़ में गागरोन से, अजमेर जिले में सागरमती के तट पर गोविन्दगढ़ से, कोटा जिले में परवन नदी के तट से तथा टोंक जिले में बनास नदी के तट पर जगन्नाथपुरा, सियालपुरा, तारावट, गोगासला, भुवाण, भरनी आदि से प्राप्त हुए हैं।
मध्यपाषाण काल :-
- मध्यपाषाण काल का आरम्भ 10 हजार ई. पू. से माना जाता है।
- इस काल के उपकरणों में ‘स्क्रेपर’ एवं ‘पाइंट’ विशेष उल्लेखनीय है जो अपेक्षाकृत छोटे-हल्के एवं कुशलतापूर्वक बनाये गये थे।
- यह उपकरण लूणी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में तथा विराटनगर (जयपुर) से प्राप्त हुए हैं।
- इस काल तक मानव पशुपालन सीख चुका था लेकिन उसे कृषि का ज्ञान नहीं था।
उत्तर/नवपाषाण काल :-
- नवपाषाण काल का आरम्भ 5 हजार ई. पू. से माना जाता है।
- नवपाषाण काल में कृषि द्वारा खाद्य उत्पादन किया जाने लगा तथा इस काल में पशुपालन उन्नत हो चुका था।
- राजस्थान में नवपाषाण काल के अवशेष चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च व गम्भीरी नदियों के तट पर, चंबल व बामनी नदियों के तट पर भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट से, बनास नदी के तट पर हम्मीरगढ़, जहाजपुर एवं देवली, गिलुण्ड से, लूणी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, से, टोंक जिले में भरनी आदि स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
- इस काल में मानव घर बनाकर रहने लगा तथा मृतकों को समाधियों में गाढ़ना प्रारम्भ कर दिया।
- प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् ‘गार्डन चाइल्ड’ ने नवपाषाण काल को पाषाणकालीन क्रांति की संज्ञा दी।
- नवपाषाण काल में समाज में व्यवसाय के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात हुआ था।
- इस युग के उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के टीलवाड़ा नाम स्थानों पर मिले हुए हैं।
शैलाश्रय :-
- राजस्थान में अरावली पर्वत शृंखला तथा चंबल नदी की घाटी से शैलाश्रय प्राप्त होते हैं, जिनसे प्रागैतिहासिक काल के मानव द्वारा उपयोग में लाए गए पाषाण उपकरण, अस्थि अवशेष तथा अन्य सामग्री प्राप्त हुई है।
- इन शैलाश्रयों में सर्वाधिक आखेट से संबंधित चित्र उपलब्ध होते हैं।
- बूँदी में छाजा नदी तथा कोटा में चंबल नदी क्षेत्र अरनीया उल्लेखनीय है।
- इनके अतिरिक्त विराटनगर (जयपुर), सोहनपुरा (सीकर) तथा हरसौरा (अलवर) आदि से चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं।
आहड़ (उदयपुर) :-

- आहड़ नामक ताम्रयुगीन सभ्यता उदयपुर में आयड़ या बेचड़ नदी के किनारे स्थित है।
- आहड़ सभ्यता का विकास बनास नदी घाटी में माना जाता है।
- दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर या आघट दुर्ग के नाम से जाना जाता था। इसे ताम्रवती नगरी भी कहा जाता था।
- इसका एक अन्य नाम धूलकोट भी है।
- इसके उत्खनन का कार्य सर्वप्रथम वर्ष 1953 में अक्षयकीर्ति व्यास के नेत्तृत्व में हुआ।
- यहाँ पर व्यापक उत्खनन कार्य आर. सी. अग्रवाल द्वारा वर्ष 1954 में करवाया गया।
- आर.सी. अग्रवाल ने आहड़ से 12 किमी. दूर मतून एवं उमरा नामक स्थानों पर ताम्र शोधन के साक्ष्य प्राप्त किए हैं।
- 1961-62 में यहाँ वी. एन. मिश्रा एवं एच. डी. सांकलिया द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया।
- आहड़ के उत्खनन अभियान के समय राजस्थान सरकार की ओर से विजय कुमार एवं पी. सी. चक्रवर्ती भी उपस्थित रहे।
- डॉ. सांकलिया ने इसे आहड़ या बनास संस्कृति कहा है।
- यहाँ पर उत्खनन के फलस्वरूप बस्तियों के कई स्तर प्राप्त हुए हैं।
- आहड़ के उत्खनित स्थल को महासत्तियों का टीला कहा जाता है।
- आहड़ एक ग्रामीण सभ्यता थी।
- आहड़ से नारी की खण्डित मृण्मूर्ति मिली है जो कमर के नीचे लहंगा धारण किए हुए हैं।
- आहड़ से मृण्मूर्तियों में क्रीस्टल, फेन्यास, जैस्पर, सेलखड़ी तथा लेपीस लाजूली जैसे कीमती उपकरणों का प्रयोग किया जाता था।
- पहले स्तर में मिट्‌टी की दीवारें, मिट्‌टी के बर्तनों के टुकड़े तथा पत्थर के ढेर प्राप्त हुए हैं।
- आहड़वासी धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों से मकानों का निर्माण करते थे।
- आहड़वासी कृषि (चावल की खेती) एवं पशुपालन (कुत्ता, हाथी आदि) से परिचित थे।
- गिलूण्ड (राजसमन्द) से आहड़ के समान धर्म संस्कृति मिली है।
- आहड़ से छपाई के ठप्पे, आटा पिसने की चक्की, चित्रित बर्तन एवं तांबे के उपकरण मिले हैं।
- आहड़ के लोग मृतकों को कपड़ों एवं आभूषण के साथ गाड़ते थे।
- आहड़ के लोगों के अधिकांशत: आभूषण मिट्‌टी के मनकों के बने होते थे।
- आहड़वासी लाल एवं काले रंग के मृदपात्रों का उपयोग करते थे।
- तीसरी बस्ती में कुछ चित्रित बर्तन तथा उनका घरों में प्रयोग करना प्रमाणित हुआ है।
- चौथी बस्ती से दो ताँबे की कुल्हाड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।
- आहड़वासी ताम्रधातु कर्मी थे।
- आहड़ से अनाज रखने के मृद्भांपड प्राप्त हुए हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘गोरे’ यो ‘कोठ’ कहा जाता है।
- आहड़ से ताँबे की छह मुद्राएं तथा तीन मुहरें प्राप्त हुई है जिनका समय तीन ईसा पूर्व से प्रथम ईसा पूर्व है।
- यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल तथा दूसरी ओर अपोलो देवता का चित्रण किया गया है। इस पर यूनानी भाषा में लेख भी अंकित किया गया है।
- यहां के मिलने वाली तीन मुहरों विहितभ विस, पलितसा तथा तातीय तोम अंकित हैं।
- यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय ताँबा गलाना तथा उससे उपकरण बनाना था।
- आहड़ से पकी ईटों के प्रयोग के प्रमाण नहीं प्राप्त हुए हैं।
- डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने आहड़ सभ्यता का समृद्ध काल 1900 ई. पू. से 1200 ई.पू. तक माना है।
- आहड़ से प्राप्त एक ही मकान में 4 से 6 चूल्हों का प्राप्त होना जिस पर एक मानव हथेली की छाप है एवं संयुक्त परिवार व्यवस्था की ओर संकेत करते है।
- आहड़ सभ्यता के लोग मिट्‌टी के बर्तन पकाने की उल्टी तिपाई विधि से परिचित थे।
- आहड़ से मिट्‌टी की बनी टेराकोटा वृषभ आकृतियां प्राप्त हुई है जिन्हें बनासियन बुल कहा गया है। जिसे टेराकोटा की संज्ञा दी गई है।
- यहां बड़े कमरों की लंबाई-चौड़ाई 33x20 फीट तक देखी गई है।
कालीबंगा :-

- कालीबंगा एक नगरीय सभ्यता थी।
- कालीबंगा कांस्ययुगीन सभ्यता मानी जाती है।
- कालीबंगा सभ्यता का समय 2350 ई.पू. से 1750 ई.पू. माना जाता है। (कार्बन डेटिंग पद्धति के अनुसार)
- कालीबंगा प्राचीन सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदी के बाएँ तट पर हनुमानगढ़ जिले में है।
नोट :- सरस्वती नदी का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मण्डल में मिलता है। सरस्वती नदी की उत्पत्ति तुषार क्षेत्र से मानी गई है। सरस्वती नदी का वर्तमान स्वरूप घग्घर नदी है। घग्घर नदी को द्वषद्वति नदी, सोतर नदी, मृत नदी, लेटी हुई नदी, राजस्थान का शोक भी कहा जाता है।
- वर्ष 1952 में पहली बार अमलानंद घोष ने इसकी पहचान सिंधुघाटी सभ्यता के स्थल के रूप में की।
- वर्ष 1961-1969 तक नौ सत्रों में बी. बी. लाल तथा बी.के. थापर जे.वी. जोशी के निर्देशन में यहाँ पर उत्खनन कार्य किया गया।
- कालीबंगा से पूर्व हड़प्पाकालीन, हड़प्पाकालीन तथा उत्तर-हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से उत्खनन में प्राप्त काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इसे कालीबंगा नाम दिया गया।
- कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ :- काले रंग की चूड़ियाँ।
- कालीबंगा स्वतंत्र भारत का पहला पुरातात्त्विक स्थल है जिसका स्वतंत्रता के बाद पहली बार उत्खनन किया गया।
- इसके पश्चात् क रोपड़ का उत्खनन किया गया।
- कालीबंगा देश का तीसरा सबसे बड़ा पुरातात्त्विक स्थल है। देश के दो बड़े पुरातात्त्विक स्थलों में राखीगढ़ी (हरियाणा) एवं धौलावीरा (गुजरात) है।
- कालीबंगा को ‘दीन-हीन’ बस्ती भी कहा जाता है।
- विश्व में सर्वप्रथम भूकम्प के साक्ष्य कालीबंगा में ही मिले हैं।
- विश्व में सर्वप्रथम लकड़ी की नाली के अवशेष कालीबंगा में से प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा क्षेत्र से मिट्‌टी से बना कुत्ता, भेड़िया, चूहा और हाथी की प्रतिमाएँ मिली हैं।
- कालीबंगा से प्राचीनतम नगर के साक्ष्य मिले हैं।
- कालीबंगा में मातृसत्तात्मक परिवार की व्यवस्था विद्यमान थी।
- कालीबंगा से कपालछेदन क्रिया का प्रमाण मिलता है।
- कालीबंगा से कलश शवदान के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा से किसी भी प्रकार के मंदिरों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं।
- कालीबंगा सभ्यता के समाज में पुरोहित का स्थान प्रमुख था।
- संस्कृत साहित्य में कालीबंगा को ‘बहुधान्यदायक क्षेत्र’ कहा जाता था।
- कालीबंगा से मिट्‌टी के भाण्डों एवं मुहरों पर लिपि के अवशेष मिले हैं।
- पक्षी प्रतिमाओं में कालीबंगा से मिली पंख फैलाए बगुले की प्रतिमा अधिक महत्वपूर्ण है।
- कालीबंगा से बेलनाकार तंदूरा भी मिला है।
- कालीबंगा निवासी गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर के साथ-साथ ऊँट एवं कुत्ता भी पालते थे।
- पाकिस्तान के कोटदीजी नामक स्थान पर प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेष कालीबंगा के अवशेषों से काफी मिलते-जुलते हैं।
- कालीबंगा के नगरों की सड़कें समकोण पर काटती थी।
- कालीबंगा में दो टीलों पर उत्खनन कार्य किया गया, पश्चिम में स्थित पहला टीला छोटा एवं अपेक्षाकृत ऊँचा है तथा पूर्व में स्थित दूसरा टीला अपेक्षाकृत बड़ा एवं नीचा है।
- यह दोनों टीलें सुरक्षात्मक दीवार से घिरे हुए थे।
- यहाँ के लोगों ने समचतुर्भुजाकार रक्षा प्राचीर के अन्तर्गत आवासों का निर्माण किया। इस सुरक्षा प्राचीर को 2 चरणों में बनाने के प्रमाण मिले हैं।
- यहाँ के लोग कच्ची ईटों से बने मकानों में रहते थे तथा मकानों की नालियाँ, शौचालय तथा कुछ संरचनाओं में पक्की ईटों का प्रयोग किया गया है।
- कालीबंगा में एक दुर्ग, बेलनाकार मुहरें, तांबे का बैल, जुते हुए खेत, सड़कें तथा मकानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगा से सात अग्निवेदिकाएँ प्राप्त हुई हैं।
- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा है (पहली हड़प्पा तथा दूसरी मोहनजोदड़ो)।
- कालीबंगा से उत्खनन में दोहरे जुते हुए खेत के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो विश्व में जुते हुए खेत के प्राचीनतम प्रमाण है।
- यहाँ से प्राप्त जुते हुए खेत में चना व सरसों बोया जाता था।
- खेत में ग्रिड पैटर्न की गर्तधारियों के निशान मिले हैं।
- कालीबंगा में समकोण दिशा में जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले है।
- यहाँ से एक ही समय में दो फसलें उगाने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं जिसमें गेहूँ तथा जौ एक साथ बोए् जाते थे।
- कालीबंगा एक नगरीय प्रधान सभ्यता थी तथा यहाँ पर नगर निर्माण नक्शे के आधार पर किया गया था।
- कालीबंगा में मकानों से गन्दे पानी को निकालने के लिए लकड़ी की नालियों का प्रयोग किया जाता था।
- कालीबंगा के लोग मुख्यतया शव को दफनाते थे।
- छेद किए हुए किवाड़ व सिंध क्षेत्र के बाहर मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन एकमात्र इसी स्थल से मिले हैं।
- कालीबंगा में तीन मानवाकृतियां मिली हैं जो भग्नावस्था में हैं।
- यहां से बच्चे की खोपड़ी मिली है जिसमें छ: छेद हैं जिसमें जल कपाली या मस्तिष्क शोध की बीमारी का पता चलता है।
- कालीबंगा सैंधव सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ से मातृदेवी की मूर्तियां प्राप्त नहीं हुई है।
- कालीबंगा से मैसोपोटामिया की मिट्‌टी से निर्मित मुहर प्राप्त हुई है।
- वर्ष 1961 में कालीबंगा अवशेष पर भारत सरकार द्वारा 90 पैसों का डाक टिकट जारी किया गया।
- राज्य सरकार द्वारा कालीबंगा से प्राप्त पुरा अवशेषों के संरक्षण हेतु वर्ष 1985-86 में एक संग्रहालय की स्थापना की गई।
- कालीबंगा सभ्यता की लिपि सैन्धवकालीन लिपि (ब्रुस्ट्रोफेदन लिपि) के समान थी जो दाएं से बाएं की ओर लिखी जाती थी। इस लिपि को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है।
- राजस्थान में कालीबंगा नामक स्थान पर विशाल सांडों की जुड़वा पैरों वाली मिट्‌टी की मूर्ति मिली है।
- कालीबंगा से मिली माटी की वृषभाकृति कला कौशल की दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
गणेश्वर (सीकर) :-

- सीकर जिले में नीम का थाना स्थान से कुछ दूरी पर स्थित गणेश्वर से उत्खनन में ताम्रयुगीन उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- यह स्थान कांतली नदी के किनारे स्थित है।
- गणेश्वर को पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता माना जाता है।
- डी.पी. अग्रवाल ने रेडियोकार्बन विधि एवं तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इस स्थल की तिथि 2800 ईसा पूर्व निर्धारित की।
- गणेश्वर को ‘पुरातत्त्व का पुष्कर’ भी कहा जाता है।
- भारत में पहली बार किसी स्थान से इतनी मात्रा में ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर से तांबे का बाण एवं मछली पकड़ने का कांटा प्राप्त हुआ है।
- गणेश्वर के उत्खनन से लगभग 2000 ताम्र आयुध व ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- इन उपकरणों में तीर, भाले, सूइयां, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने के कांटे आदि शामिल हैं।
- गणेश्वर को भारत में ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ कहा जाता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य रत्नचंद्र अग्रवाल द्वारा वर्ष 1977 में तथा विस्तृत उत्खनन वर्ष 1978-79 में विजय कुमार द्वारा करवाया गया।
- गणेश्वर से उत्खनन में जो मृद्भांपड प्राप्त हुए है उन्हें कपिषवर्णी मृद्पात्र कहते हैं।
- गणेश्वर से मिट्‌टी के छल्लेदार बर्तन भी प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर से काले एवं नीले रंग से अलंकृत मृद्पात्र मिले हैं।
- गणेश्वर में बस्ती को बाढ़ से बचाने हेतु वृहदाकार पत्थर के बाँध बनाने के प्रमाण मिले हैं।
- गणेश्वर में ईंटों के उपयोग के प्रमाण नहीं मिले हैं।
- मिट्‌टी के छल्लेदार बर्तन केवल गणेश्वर में ही प्राप्त हुए हैं।
- गणेश्वर सभ्यता के उत्खनन से दोहरी पेचदार शिरेवाली ताम्रपिन भी प्राप्त हुई है।
- गणेश्वर सभ्यता के लोग गाय, बैल, बकरी, सूअर, कुत्ता, गधा आदि पालते थे।
- गणेश्वर सभ्यता को ‘ताम्र संचयी संस्कृति’ भी कहा जाता है।
गिलूण्ड (राजसमंद) :-

- यह ताम्रयुगीन सभ्यता राजसमन्द जिले में बनास नदी के तट पर स्थित है।
- ‘मोडिया मगरी’ नामक टीले का संबंध गिलूण्ड सभ्यता से है।
- वर्ष 1957-58 में बी. बी. लाल द्वारा यहाँ पर उत्खनन कार्य करवाया गया।
- यहां सांस्कृतिक स्तर पर लगभग एक हजार वर्ष ईसा पूर्व के स्लेटी रंग की तश्तरियां एवं कटोरे प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर पक्की ईंटों के प्रयोग के साक्ष्य प्राप्त होते हैं।
- यहाँ पर उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता एवं बाद की सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ पर आहड़ सभ्यता का प्रसार था तथा इसी के समय यहाँ मृद्भांपड, मिट्‌टी की पशु आकृतियां आदि के चित्र मिले हैं।
- गिलूंड के मृदभांडो पर ज्यामितीय चित्रांकन के अलावा प्राकृतिक चित्रांकन भी किया गया है।
- गिलूण्ड में उच्च स्तरीय जमाव में क्रीम रंग एवं काले रंग से चित्रित पात्रों पर नृत्य मुद्राएं एवं चिकतेदार हरिण प्रकाश में आए हैं।
- गिलूण्ड में लाल एवं काले रंग के मृदभाण्ड मिले हैं।
बैराठ (जयपुर) :-

- बैराठ जयपुर जिले में शाहपुरा उपखण्ड में बाणगंगा नदी के किनारे स्थित लौहयुगीन स्थल है।
- बैराठ का प्राचीन नाम ‘विराटनगर’ था। महाजनपद काल में यह मत्स्य जनपद की राजधानी था।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1936-37 में दयाराम साहनी द्वारा तथा वर्ष 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
- 1837 ई. में कैप्टन बर्ट ने यहाँ से मौर्य सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख की खोज की। वर्तमान में यह शिलालेख कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है।
- भाब्रू शिलालेख में सम्राट अशोक को ‘मगध का राजा’ नाम से संबोधित किया गया है।
- भाब्रू शिलालेख के नीचे बुद्ध, धम्म एवं संघ लिखा हुआ है।
- बैराठ में बीजक की पहाड़ी, भीमजी की डूँगरी तथा महादेवजी की डूँगरी से उत्खनन कार्य किया गया।
- यहाँ से मौर्यकालीन तथा इसके बाद के समय के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से 36 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं जिनमें 8 पंचमार्क चाँदी की तथा 28 इण्डो-ग्रीक तथा यूनानी शासकों की हैं। 16 मुद्राएँ यूनानी शासक मिनेण्डर की है।
- उत्तर भारतीय चमकीले मृद्‌भांड वाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले राजस्थान में सबसे महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल बैराठ है।
- वर्ष 1999 में बीजक की पहाड़ी से अशोक कालीन गोल बौद्ध मंदिर, स्तूप एवं बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं जो हीनयान सम्प्रदाय से संबंधित है।
- बैराठ सभ्यता के लोगों का जीवन पूर्णत: ग्रामीण संस्कृति का था।
- बैराठ में पाषाणकालीन हथियारों के निर्माण का एक बड़ा कारखाना स्थित था।
- यहाँ भवन निर्माण के लिए मिट्‌टी की बनाई ईंटों का प्रयोग अधिक किया जाता था।
- यहाँ पर शुंग एवं कुषाण कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- बैराठ सभ्यता के लोग लौह धातु से परिचित थे। यहाँ उत्खनन से लौहे के तीर तथा भाले प्राप्त हुए हैं।
- ऐसा माना जाता है कि हूण शासक मिहिरकुल ने बैराठ को नष्ट कर दिया।
- 634 ई. में ह्वेनसांग विराटनगर आया था तथा उसने यहाँ बौद्ध मठों की संख्या 8 बताई है।
- बैराठ से ‘शंख लिपि’ के प्रमाण प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से मुगलकाल में टकसाल होने के प्रमाण मिलते है। यहाँ मुगल काल में ढाले गए सिक्कों पर ‘बैराठ अंकित’ मिलता है।
- यहाँ बनेड़ी, ब्रह्मकुण्ड तथा जीणगोर की पहाड़ियों से वृषभ, हरिण तथा वनस्पति का चित्रण प्राप्त होता है।
बालाथल (उदयपुर) :-

- उदयपुर जिले में बालाथल गाँव के पास बनास या बेड़च नदी के निकट एक टीले के उत्खनन से यहाँ ताम्र-पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- इस सभ्यता की खोज वर्ष 1962-63 में डॉ. वी. एन. मिश्र द्वारा की गई।
- डॉ. वी. एस. शिंदे, आर. के. मोहन्ते, डॉ. देव कोठारी एवं डॉ. ललित पाण्डे का सम्बन्ध इसी सभ्यता से माना जाता है। इन्होंने 1993 में इस सभ्यता का उत्खनन किया था।
- बालाथल में उत्खनन से एक 11 कमरों के विशाल भवन के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ के लोग बर्तन बनाने तथा कपड़ा बुनने के बारे में जानकारी रखते थे।
- बालाथल से लौहा गलाने की 5 भटि्टयाँ प्राप्त हुई हैं।
- बालाथल से कपड़े का टुकड़ा प्राप्त हुआ है।
- बालाथल के उत्खनन में मिट्‌टी से बनी सांड की आकृतियाँ मिली हैं।
- बालाथल निवासी माँसाहारी भी थे।
- यहाँ से 4000 वर्ष पुराना कंकाल मिला है जिसको भारत में कुष्ठ रोग का सबसे पुराना प्रमाण माना जाता है।
- यहाँ से योगी मुद्रा में शवाधान का प्रमाण प्राप्त हुआ है।
- बालाथल में अधिकांश आभूषण व उपकरण तांबे के बने प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ के लोग कृषि, शिकार तथा पशुपालन आदि से परिचित थे।
- बालाथल से प्राप्त बैल व कुत्ते की मृण्मृर्तियाँ विशेष उल्लेखनीय है।
नगरी (चित्तौड़गढ) :-

- नगरी नामक पुरातात्त्विक स्थल चितौड़गढ़ में बेड़च नदी के तट पर स्थित है जिसका प्राचीन नाम माध्यमिका मिलता है।
- यहाँ पर सर्वप्रथम उत्खनन कार्य वर्ष 1904 में डॉ. डी. आर. भण्डारकर द्वारा तथा तत्पश्चात वर्ष 1962-63 में केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा करवाया गया।
- यहाँ से शिवि जनपद के सिक्के तथा गुप्तकालीन कला के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- प्राचीन नाम ‘माध्यमिका’ पतंजलि के महाभाष्य में मिलता है।
- यहाँ से ही घोसूण्डी अभिलेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) प्राप्त हुआ है।
- नगरी शिवि जनपद की राजधानी रही है।
- यहाँ पर ‘कुषाणकालीन स्तर’ में नगर की सुरक्षा हेतु निर्मित मजबूत दीवार बनाए जाने के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- नगरी की खोज वर्ष 1872 ई. में कार्लाईल द्वारा की गई।
- यहाँ से चार चक्राकार कुएँ भी प्राप्त हुए हैं।
रंगमहल (हनुमानगढ़) :-

- रंगमहल हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती (वर्तमान में घग्घर) नदी के पास स्थित है।
- यह एक ताम्रयुगीन सभ्यता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य डॉ. हन्नारिड के निर्देशन में स्वीडिश दल द्वारा वर्ष 1952-54 ई. में किया गया।
- ये मृद्भांपड चाक से बने होते थे तथा ये पतले तथा चिकने होते थे।
- यहाँ से कुषाणकालीन तथा उससे पहले की 105 तांबे की मुद्राएँ प्राप्त हुई है जिनमें कुछ पंचमार्क मुद्राएं भी है।
- यहाँ से ब्राह्मी लिपि में नाम अंकित दो कांसे की सीलें भी प्राप्त हुई है।
- यहाँ से उत्खनन में डॉ. हन्नारिड को प्राप्त मिट्‌टी का कटोरा स्वीडन के लूण्ड संग्रहालय में सुरक्षित है।
- यहाँ के निवासी मुख्य रूप से चावल की खेती करते थे।
- यहाँ के मकानों का निर्माण ईटों से होता था।
- यहाँ से प्राप्त मृद्भांाड मुख्यत: लाल या गुलाबी रंग के थे।
- यहाँ से गांधार शैली की मृणमूर्तियाँ, टोटीदार घड़े, घण्टाकार मृद्पात्र एवं कनिष्क कालीन मुद्राएं प्राप्त हुई हैं।
- रंगमहल से ही गुरु-शिष्य की मिट्‌टी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
- रंगमहल में बसने वाली बस्तियों के तीन बार बसने एवं उजड़ने के प्रमाण मिले हैं।
रैढ़ (टोंक) :-

- रैढ़ टोंक जिले की निवाई तहसील में ढील नदी के किनारे स्थित पुरातात्त्विक स्थल है।
- यह एक लौह युगीन सभ्यता है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1938-39 में दयाराम साहनी के नेत्तृत्व में तथा अंतिम रूप में उत्खनन कार्य डॉ. केदारनाथ पूरी के द्वारा करवाया गया।
- उत्खनित क्षेत्र का विवरण के.एन. पुरी ने जयपुर शासन के तत्वाधान में एस्केवैशनएट रैढ़ में प्रकाशित किया है।
- रैढ़ के उत्खनन से बड़ी मात्रा में मिलने वाले लौह उपकरणों तथा मुद्राओं के कारण इसे प्राचीन भारत का टाटानगर कहा जाता है।
- यह एक धातु केंद्र था जहाँ पर औद्योगिक कार्य एवं निर्यात हेतु उपकरण एवं औजार बनाए जाते थे।
- रैढ़ में उत्खनन से 3075 आहत मुद्राएं तथा 300 मालव जनपद के सिक्के प्राप्त हुए है। यहाँ से यूनानी शासक अपोलोडोट्स का एक खण्डित सिक्का भी प्राप्त हुआ है।
- रैढ़ में उत्खनन से हल्के गुलाबी रंग से मिट्‌टी का बना एक संकीर्ण गर्दन वाला फूलदान प्राप्त हुआ है।
- यहाँ से प्राप्त मृद्भांपड चक्र से निर्मित है तथा यहाँ से विभिन्न प्रकार के मिट्‌टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ के मृद्भांमडो में गोल ‘रिंग वेल्स’ एक दूसरे पर लगा दिए जाते थे।
- रैढ़ में पकाई गई मातृ देवी व शक्ति के विभिन्न रूपों की मूर्तियां प्राप्त हुई है।
- यहाँ से कर्णफूल, गले का हार, चूड़ियां, पायजेब आदि आभूषणों के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से आलीशान इमारतों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ से मृतिका से बनी यक्षिणी की प्रतिमा प्राप्त हुई है जो संभवत: शुंग काल की मानी जाती है।
- यहाँ से मालव जनपद के 14 सिक्के, 6 सेनापति सिक्के एवं 7 वपू के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- रैढ़ से एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
- रैढ़ से जस्ते को साफ करने के प्रमाण मिले है।
- रैढ़ के निवासी मोटा एवं बारीक कपड़ा बनाने में सिद्धहस्त थे।
- अशोक तकनीक से पॉलिश किया हुआ चूनार बलूआ पत्थर का एक बड़ा प्याला भी मिला है जो संभवत: बाहर से आयात किया हुआ है।
बागोर (भीलवाड़ा) :-

- यह एक पाषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
- यह स्थल भीलवाड़ा की मांडल तहसील में कोठारी नदी के तट पर स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1967-68 में डॉ. विरेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. एल.एस. लेश्निक व डेक्कन कॉलेज पूना तथा राजस्थान पुरातत्त्व विभाग के सहयोग से किया गया।
- बागोर सभ्यता के तीन स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- महासतियों का टीला :- बागोर सभ्यता का उत्खनन स्थल
- बागोर की सभ्यता को ‘आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ माना जाता है।
- यहाँ से लघु पाषाणोंपकरण, हथौड़े, गोफन की गोलियां, चपटी व गोल शिलाएं, छेद वाले पत्थर व एक कंकाल पर ईटों की दीवार जो समाधि का द्योतक है मिलती हैं।
- यहाँ से 14 प्रकार की कृषि किए जाने के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ के लोग कृषि, पशुपालन एवं आखेट करते थे।
- यहाँ उत्खनन से पाँच तांबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं जिनमें से एक 10.5 सेमी. छेद वाली सूई है।
- बागोर में कृषि एवं पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ के मकान पत्थर से बने थे तथा फर्श में भी पत्थरों को समतल कर जमाया जाता था।
- यहाँ से प्राप्त पाषाण उपकरणों में ब्लेड, छिद्रक, स्क्रेपर तथा चांद्रिक आदि प्रमुख हैं।
सुनारी (झुंझुनूं) :-

- सुनारी नामक पुरातात्त्विक स्थल झुंझुनूं की खेतड़ी तहसील में कांतली नदी के किनारे स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1980-81 में राजस्थान राज्य पुरातत्त्व विभाग द्वारा करवाया गया।
- यहाँ से लौहा गलाने की प्राचीनतम भटि्टयाँ प्राप्त हुई है।
- यहाँ से स्लेटी रंग के मृद्भांड संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- सुनारी से मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ तथा धान संग्रहण का कोठा प्राप्त हुआ है।
- सुनारी से मौर्यकालीन सभ्यता के अवशेष मिलते हैं जिनमें काली पॉलिश युक्त मृद्पात्र है।
- जोधपुरा, नोह तथा सुनारी से शुंग तथा कुषाणकालीन अवशेष भी प्राप्त होते हैं।
- सुनारी के निवासी भोजन के चावल का प्रयोग करते थे तथा घोड़ों से रथ खींचते थे।
- सुनारी से लौहे के तीर, भाले के अग्रभाग, लौहे का कटोरा तथा कृष्ण परिमार्जित मृद्पाेत्र भी मिले हैं।
ओझियाना (भीलवाड़ा) :-

- भीलवाड़ा के बदनोर के पास खारी नदी के तट पर स्थित यह स्थल ताम्रयुगीन आहड़ संस्कृति से संबंधित है।
- इस स्थल का उत्खनन बी. आर. मीणा तथा आलोक त्रिपाणी द्वारा वर्ष 1999-2000 में किया गया।
- यह पुरातात्त्विक स्थल पहाड़ी पर स्थित था जबकि आहड़ संस्कृति से जुड़े अन्य स्थल नदी घाटियों में पनपे थे।
- यहाँ से वृषभ तथा गाय की मृण्यमय मूतियां प्राप्त हुई है जिन पर सफेद रंग से चित्रण किया हुआ है।
- यहाँ से प्राप्त अवशेषों के आधार पर इस संस्कृति का विकास तीन चरणों में हुआ माना जाता है।
- यहाँ से कार्नेलियन फियान्स तथा पत्थर के मनके, शंख एवं ताम्र की चूड़ियाँ तथा अन्य आभूषण भी मिले हैं।
- इस सभ्यता का काल 2500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक माना जाता है।
जोधपुरा (जयपुर) :-

- जोधपुरा नामक पुरातात्त्विक स्थल जयपुर जिले की कोटपुतली तहसील में साबी नदी के किनारे स्थित है।
- यह एक लौहयुगीन प्राचीन सभ्यता स्थल है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1972-73 में आर.सी. अग्रवाल तथा विजय कुमार के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
- जोधपुरा से ताम्रयुगीन सभ्यता के प्रतीक कपिषवर्णी मृद्भांडो का डेढ़ मीटर का जमाव प्राप्त हुआ है।
- यहाँ उत्खनन से प्राप्त ताम्रयुगीन मृद्भां डों पर सिंधु सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है।
- यह सलेटी रंग की चित्रित मृद्भांैड संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल था।
- जोधपुरा से लौह अयस्क से लौह धातु का निष्कर्षण करने वाली भटि्टयाँ भी प्राप्त हुई है।
- इस सभ्यता में मानव ने घोड़े का उपयोग रथ के खींचने में करना प्रारम्भ कर दिया था।
- जोधपुरा में मकान की छतों पर टाईल्स का प्रयोग एवं छप्पर छाने का रिवाज था।
- इस सभ्यता के लोगों का मुख्य आहार चावल एवं माँस था।
- यह सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ई. के मध्य फली-फूली।
- यह शुंग एवं कुषाणकालीन सभ्यता स्थल है।
- जोधपुरा एवं सुनारी (झुंझुनूं) से मौर्यकालीन सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
ईसवाल (उदयपुर) :-

- लौह युगीन सभ्यता।
- प्राचीन औद्योगिक बस्ती।
- इस स्थल का उत्खनन कार्य राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के पुरातत्त्व विभाग के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ से निरन्तर लौहा गलाने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से प्राक् ऐतिहासिक काल से मध्यकाल तक का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव बस्ती के प्रमाण पाँच स्तरों से प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर 5वीं शताब्दी ई.पू. में लोहा गलाने का उद्योग विकसित होने के प्रमाण है।
- यहाँ से प्राप्त सिक्कों को प्रांरभिक कुषाणकालीन माना जाता है।
- मौर्य, शुंग, कुषाणकाल में यहाँ लौहा गलाने का कार्य होता था।
- यहाँ उत्खनन में ऊँट का दाँत एवं हडि्डयाँ मिली हैं।
- यहाँ के मकान पत्थरों से बनाये जाते थे।
नोह (भरतपुर) :-

- वर्ष 1963-64 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में यहाँ पर उत्खनन कार्य किया गया।
- रेडियो कार्बन तिथि के अनुसार इस सभ्यता का समय 1100 ई.पू. से 900 ई.पू. माना जाता है।
- यहाँ से उत्खनन में विशालकाय यक्ष प्रतिमा तथा मौर्यकालीन पॉलिश युक्त चुनार के चिकने पत्थर से टुकड़े प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से प्राप्त एक पात्र पर ब्राह्मी लिपि में लेख अंकित है।
- यह एक लौहयुगीन सभ्यता है तथा यहाँ से प्राप्त भांड काले तथा लाल वेयर युक्त है।
- यहाँ पर एक ही स्थान से 16 रिंगवेल प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से 5 सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से लौहे के कृषि संबंधी उपकरण एवं चक्रकूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ के निवासी मकान बनाने के लिए पक्की ईंटों का प्रयोग करते थे।
- यहाँ से कुषाण नरेश हुविस्क एवं वासुदेव के सिक्के प्राप्त हुए है।
- नोह से ताम्र युगीन, आर्य युगीन एवं महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
नगर (टोंक) :-

- नगर पुरातात्त्विक स्थल टोंक जिले में उणियारा कस्बे के पास स्थित है। इसे कर्कोट नगर भी कहा जाता है।
- इसका प्राचीन नाम ‘मालव नगर’ था।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1942-43 में श्रीकृष्ण देव द्वारा किया गया।
- यहाँ से बड़ी संख्या में मालव सिक्के तथा आहत मुद्राएं प्राप्त हुई है।
- यहाँ से प्राप्त मृदभांडो के अधिकतर अवशेषों का रंग लाल है।
- नगर में उत्खनन से गुप्तोत्तर काल की स्लेटी पत्थर से निर्मित महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- इसके अतिरिक्त यहाँ से मोदक रूप में गणेश का अंकन, फणधारी नाग का अंकन, कमल धारण किए लक्ष्मी की खड़ी प्रतिमा प्राप्त हुई है।
- वर्तमान में नगर सभ्यता को ‘खेड़ा सभ्यता’ के नाम से जाना जाता है।
- नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के मिले हैं।
- नगर से लाल रंग के मृद्भां ड एवं अनाज भरने के कलात्मक मटकों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
बरोर (श्री गंगानगर) :-

- श्री गंगानगर में सरस्वती नदी के तट पर इस सभ्यता के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- वर्ष 2003 में यहाँ उत्खनन कार्य शुरू किया गया।
- यहाँ से प्राप्त अवशेषों के आधार पर इस सभ्यता को प्राक् प्रारंभिक तथा विकसित हड़प्पा काल में बांटा गया है।
- यहाँ के मृद्भांतडों में काली मिट्‌टी के प्रयोग के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- वर्ष 2006 में यहाँ मिट्‌टी के पात्र में सेलखड़ी के 8000 मनके प्राप्त हुए हैं।
- यह स्थल हड़प्पाकालीन विशेषताओं के समान जैसे सुनियोजित नगर व्यवस्था, मकान निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग तथा विशिष्ट मृद्भां ड परम्परा आदि से युक्त है।
- यहाँ से बटन के आकार की मुहरें प्राप्त हुई हैं।
तिलवाड़ा (बाड़मेर) :-

- तिलवाड़ा बाड़मेर जिले में लूणी नदी के किनारे स्थित पुरातात्त्विक स्थल है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1967-68 में ‘राजस्थान राज्य पुरातत्त्व विभाग’ द्वारा करवाया गया।
- यहाँ पर उत्खनन का कार्य डॉ. वी. एन. मिश्र के नेतृत्व मंा किया गया।
- यह एक ताम्र पाषाणकालीन स्थल है जहाँ से 500 ई. पू. से 200 ई. तक विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ से उत्तर पाषाण युग के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ पर उत्खनन से पाँच आवास स्थलों के अवशेष मिले हैं।
- यहाँ एक अग्निकुण्ड मिला है जिसमें मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशुओं के अवशेष मिले हैं।
जूनाखेड़ा (पाली) :-

- इस पुरातात्त्विक स्थल की खोज गैरिक ने की थी।
- यहाँ से उत्खनन में मिट्‌टी के बर्तन पर ‘शालभंजिका’ का अंकन मिला है।
- इसके अतिरिक्त यहाँ से काले ओपदार कटोरे तथा छोटे आकार के दीपक प्राप्त हुए हैं।
भीनमाल (जालोर) :-

- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1953-54 में रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ के मृद्पा त्रों पर विदेशी प्रभाव दिखाई देता है।
- यहाँ की खुदाई से मृद्भां ड तथा शक क्षत्रपों के सिक्के प्राप्त हुए है।
- भीनमाल से यूनानी दुहत्थी सुराही भी प्राप्त हुई है।
- यहाँ से रोमन ऐम्फोरा (सुरापात्र) भी मिला है।
- यहाँ से ईसा की प्रथम शताब्दी एवं गुप्तकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- संस्कृत विद्वान महाकवि माघ एवं गुप्तकालीन विद्वान ब्रह्मगुप्त का जन्म स्थान भीनमाल ही माना जाता है।
- चीनी यात्री हेनसांग ने भी भीनमाल की यात्रा की।
नलियासर (जयपुर) :-

- जयपुर स्थित इस पुरातात्त्विक स्थल से चौहान वंश से पूर्व की सभ्यता के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से ब्राह्मी लिपि में लिखित कुछ मुहरें प्राप्त हुई है।
- यहाँ से आहत मुद्राएँ, उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, कुषाण शासक हुविस्क, इण्डोग्रीक, यौधेयगण तथा गुप्तकालीन चाँदी के सिक्के मिले हैं।
- यहाँ से 105 कुषाणकालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- इस सभ्यता का समय तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी सदी तक माना जाता है।
लाछूरा (भीलवाड़ा) :-

- यह पुरातात्त्विक स्थल भीलवाड़ा जिले की आसींद तहसील में स्थित है।
- यहाँ पर उत्खनन कार्य वर्ष 1998-1999 में बी. आर. मीना के निर्देशन में किया गया।
- यहाँ से 700 ई. पू. से 200 ई. तक की सभ्यताओं के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से मानव तथा पशुओं की मृण्यमूर्तियां, तांबे की चूड़ियां, मिट्‌टी की मुहरें जिस पर ब्राह्मी लिपि में 4 अक्षर अंकित है, ललितासन में नारी की मृण्यमूर्ति आदि प्राप्त हुए हैं।
- यहाँ से शुंगकालीन तीखे किनारे वाले प्याले प्राप्त हुए हैं।
बयाना :-

- यह भरतपुर में स्थित है।
- इसका प्राचीन नाम श्रीपंथ है।
- यहाँ से गुप्तकालीन सिक्के एवं नील की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
मलाह (भरतपुर) :-

- यह स्थल भरतपुर जिले के घना पक्षी अभयारण्य में स्थित है।
- इस स्थल से अधिक संख्या में तांबे की तलवारें एवं हार्पून प्राप्त हुए हैं।
सोंथी (बीकानेर):-

- यह बीकानेर में स्थित है।
- खोज :- अमलानंद घोष द्वारा ( वर्ष 1953 में) की गई।
- यह कालीबंगा प्रथम के नाम से प्रसिद्ध है।
- यहाँ पर हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
कोटड़ा (झालावाड़) :-

- इस स्थल का उत्खनन वर्ष 2003 में दीपक शोध संस्थान द्वारा किया गया।
- यहाँ से 7वीं से 12वीं शताब्दी मध्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
कणसव (कोटा) :-

- इस स्थल से मोर्य शासक धवल का 738 ई. से संबंधित लेख मिला है।

कुराड़ा (नागौर) :-

- यह ताम्रयुगीन सभ्यता स्थल है।
- यहाँ से ताम्र उपकरणों के अतिरिक्त प्रणालीयुक्त अर्घ्यपात्र प्राप्त हुआ है।
डडीकर (अलवर):-

- इस स्थल से पाँच से सात हजार वर्ष पुराने शैलचित्र प्राप्त हुए हैं।

किराडोत (जयपुर) :-

- इस सभ्यता स्थल से ताम्रयुगीन 56 चूड़ियाँ प्राप्त हुई है। इसमें अलग-अलग आकार की 28 चूड़ियों के 2 सेट प्राप्त हुए हैं।

गरड़दा (बूँदी) :-

- छाजा नदी के किनारे स्थित इस स्थान से पहली बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग प्राप्त हुई है।
- यह देश में प्रथम पुरातत्त्व महत्त्व की पेंटिंग है।
बांका :-

- यह भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
- यहाँ से राजस्थान की प्रथम अलंकृत गुफा मिली है।
नैनवा (बूँदी) :-

- यहाँ पर उत्खनन कार्य श्रीकृष्ण देव के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
- इस स्थल से 2000 वर्ष पुरानी महिषासुरमर्दिनी की मृणमूर्ति प्राप्त हुई है।
गुरारा :-

- सीकर जिले में स्थित है।
- यहाँ से हमें चाँदी के 2744 पंचमार्क सिक्के मिले हैं।



क्र.स.

संस्कृति काल

स्थल


1.

पुरापाषाण काल

डीडवाना एवं जायल (नागौर), भानगढ़ (अलवर), विराटनगर (जयपुर), दर (भरतपुर), इन्द्रगढ़ (कोटा)


2.

मध्यपाषाण काल

बागौर (भीलवाड़ा), विराटनगर (जयपुर), तिलवाड़ा (बाड़मेर)


3.

नवपाषाण काल

आहड़ (उदयपुर), कालीबंगा (हनुमानगढ़), गिलूण्ड (राजसमंद), झर (जयपुर)


4.

ताम्रपाषाण काल

बागौर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर), बालाथल (उदयपुर)


5.

ताम्रयुगीन

गणेश्वर (सीकर), साबणियां, पूंगल (बीकानेर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), बेणेश्वर (डूँगरपुर), नन्दलालपुरा, किराड़ोत, चीथबाड़ी (जयपुर), कुराड़ा (परबतसर), पलाना (जालौर), मलाह (भरतपुर), कोल माहौली (सवाईमाधोपुर)


6.

लौहयुगीन

नोह (भरतपुर), सुनारी (झुँझुंनूँ), विराटनगर, जोधपुरा, सांभर (जयपुर), रैढ़, नगर, नैणवा (टोंक), भीनमाल (जालोर), नगरी (चित्तौड़गढ़), चक-84, तरखानवाला (श्रीगंगानगर), ईसवाल (उदयपुर)



अन्य तथ्य :-
- नोह एवं जोधपुरा के उत्खनन से ताँबे की सामग्री नहीं मिली है।
- आर्य सभ्यता के समकालीन राजस्थान के पुरास्थलों में सुनारी (झुँझुनूँ), बैराठ (जयपुर), अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर), चक-84 (श्रीगंगानगर), तरखानवाला (श्रीगंगानगर), नोह (भरतपुर) एवं जोधपुरा (जयपुर) प्रमुख हैं।